विचार

कोरोना के वीभत्स चरण में कौन कितना आलोच्य हो सकता है, इस पर गौर करते हुए लोकतांत्रिक अधिकारों का विवेचन करेंगे या मानवता के सवालों का अर्थ खोज पाएंगे। यह टेढ़ी फकीरी है, जहां लंगर और लंगोट हार रहे हैं, फिर भी हम उन्मादी बनकर कोरोना को परास्त नहीं कर पाएंगे। यह प्रतिकूलता के बीच

हम अभी तक ‘द लांसेट’ को प्रख्यात वैज्ञानिक और चिकित्सीय शोध पत्रिका मानते थे। अब भी असंख्य लोगों का अभिमत यही होगा, लेकिन हमारी धारणा एकदम चकनाचूर हुई है। बड़ा विस्फोटक मोहभंग हुआ है। हमें एहसास है कि ‘लांसेट’ के अस्तित्व और स्वीकार्यता पर इसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन मोहभंग छोटे-छोटे कंकर-पत्थर होते

समय के साथ भले ही दुनिया भर के जंगलों में हाथी किसी गंजे के सिर पर बचे बालों जितने बाकी रह गए हों, लेकिन सरकारी और सियासी अखाड़ों में स़फेद हाथियों के अनुपात में हवाई हाथियों की गिनती हर रोज़ बढ़ती जा रही है। हैरत तो इस बात की है कि सभ्यता के आरंभ से

सरकार को अन्य देशों की मुद्रा के उतार-चढ़ाव सीमा शुल्क में मुश्किलें जैसे कई मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा। देश के चिह्नित फूड पार्कों में विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा, शोध सुविधाओं और परीक्षण प्रयोगशालाओं को मजबूत बनाना होगा। 15वें वित्त आयोग द्वारा गठित कृषि निर्यात पर उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह ने जो सिफारिशें सरकार को

भारत में बनाई गई कई दवाएं पूरी दुनिया में जाती हैं और लोगों की जान बचाती हैं। कोरोना के खिलाफ बने टीके को हमने उन देशों तक पहुंचाया जहां उस समय इस मदद की अधिक जरूरत थी। यह भारत का मानवीय पहलु है। केंद्र सरकार ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए और मांग के

यह स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच एक विरोधाभास है कि वायरस की तीसरी लहर आएगी या नहीं। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार अगर हम चिकित्सा उपकरणों जैसे वेंटिलेटर, आक्सीजन, बेड और अस्थायी अस्पतालों की उचित व्यवस्था करते हैं और  मास्क के उचित उपयोग, दो मीटर की दूरी, हाथ धोने, सेनेटाइजर का उपयोग आदि सावधानियां रखेंगे, तो  तीसरी

कोरोना वायरस की घुटन से जिनकी सांसें उखड़ रही थीं, अब उन्हें जल्द राहत मिल सकती है, क्योंकि एक और ‘संजीवनी’ की तलाश सार्थक हो गई है। रक्षा मंत्रालय के डीआरडीओ के वैज्ञानिकों के प्रयोग और परीक्षण सफल रहे हैं, नतीजतन एक और संपूर्ण स्वदेशी दवा का आविष्कार हुआ है-2 डीजी। यानी 2 डीऑक्सी-डी-ग्लूकोज। चूंकि

प्रतीक्षा में परीक्षा और स्कूल की खामोश घंटियां, भविष्य की चादर ओढ़े शिक्षा के प्रमाण सो रहे हैं। यकायक टन सी आवाज में उद्घाटित घोषणा शिक्षा की सीढि़यां बदल देती है और तब समुद्र सरीखा ज्ञान एक सफा बन जाता है। मैट्रिक की परीक्षा बिना नहाए-धोए अब शिक्षा की गर्दन पर एक नोटिस चस्पां कर

दरअसल नेता के गले के बाहर खुजली हो रही थी, लेकिन उसे लगा अंदर कोरोना हो गया है। डाक्टरों ने कहा गले के बाहर यानी गर्दन पर खुजली है, चिंता की कोई बात नहीं। नेता अपनी तनी हुई गर्दन पर खुजली का कारण ढूंढ रहे थे, इसलिए उनकी चमड़ी की जांच शुरू हो गई। चमड़ी