विचार

बेशक हमारे देश में कोरोना वायरस के मामले घट रहे हैं, लेकिन अभी संक्रमण में स्थिरता के आसार नहीं हैं। कोविड अब भी मौजूद है और स्थिरता की अंतिम स्थिति का इंतज़ार करना पड़ेगा। हालांकि भारत सरकार का विश्लेषण है कि 18 राज्यों में स्थिरता के रुझान स्पष्ट होने लगे हैं, लेकिन कोई दावा नहीं

राज्यों को इनके घरों के पास कामकाज के इंतजाम करने होंगे। यह ग्रामीण व्यवस्था को सुदृढ़ करने से मुमकिन हो सकेगा। रोजगार की परिकल्पना नए सिरे से किए जाने की जरूरत है… प्रधानमंत्री ने 20 अप्रैल की शाम को राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था कि राज्य प्रवासी मजदूरों का भरोसा जगाए रखें और

ऐसी विषम परिस्थिति में मानवता को सुरक्षित रखने में नर्सों व अन्य स्वास्थ्य कर्मियों का अद्वितीय योगदान प्रत्येक देशवासी के लिए अमूल्य है। नर्स का कार्य आवश्यक सेवा श्रेणी में आता है, जिस कारण प्रत्येक आपातकालीन स्थिति में इन्हें अपनी सेवा में उपस्थित रहना पड़ता है। देश व प्रदेश की नर्सों को नर्सिज दिवस की

आपातकाल में अच्छे काम का कोई मॉडल नहीं, परिस्थितियों के सही अर्थ में जो कर गया, वही तो काम का माना जाएगा। कोरोना काल की तमाम नकारात्मक सूचनाओं के बीच जो चेहरे परिस्थितियां बदलने पर आमादा, उन्हें यह वक्त हमेशा याद रखेगा। यह वक्त एक ऐसी कोशिश है, जो पहले नहीं हुई। हर प्रयास का

अमरीकी राष्ट्रपति के चिकित्सा सलाहकार एवं विश्व विख्यात महामारी विशेषज्ञ डा. एंथनी फाउची और विश्व स्वास्थ्य संगठन के बयान एक साथ सार्वजनिक हुए हैं। डा. फाउची का कहना है कि भारत दुनिया में सबसे बड़ा टीका-निर्माता देश है। उसे न केवल अपने टीकाकरण अभियान की गति बढ़ानी चाहिए, बल्कि उन देशों की मदद भी करनी

-राजेश कुमार चौहान, सुजानपुर टीहरा अगर इनसान ने कुदरत से छेड़छाड़ बंद नहीं की और पर्यावरण को संभालने के लिए गंभीरता नहीं दिखाई तो क्या भविष्य में कुदरत कहर बरपा कर प्राणी जाति के लिए और विकट मुसीबतें नहीं पैदा करेगी? इनसान ने विज्ञान में इतनी तरक्की कर ली है कि वह भूल गया है

वे जिए भले ही हर किस्म के प्रोटोकॉल से परे हों, पर वे मरे तो पूरे प्रोटोकॉल में मरे। उनके मरने के वक्त तक तय हो चुका था कि उनके साथ उनके मरने पर पांच से छह नहीं होंगे। हुए तो फाइन होगा। लो भैयाजी! जिंदा जी तो हम मन से किसी के साथ चल

बड़े व्यापारियों ने सीमेंट, लोहे और एयर कंडीशनर आदि की आपूर्ति की, उस उत्पादन में रोजगार कम संख्या में बने, आम आदमी के हाथ में रकम कम आई और बाजार में मांग कम बनी। बड़ी कंपनियों का कार्य अवश्य बढ़ा परंतु जमीनी स्तर पर अर्थव्यवस्था में चाल नहीं बनी। इसकी तुलना में यदि सरकार संसद

आज देश की हालत किस कद्र नाजुक बनती जा रही कोई सोचने को तैयार नहीं है। राजनीतिक रैलियों का आयोजन करवाकर सरकारें स्वयं के बनाए हुए नियमों को तोड़कर जनता को लापरवाही बरतने के लिए प्रेरित करती रही है। नियमों की दुहाई देने वाले ही अगर उन्हें तोड़ें, तो जनता से फिर क्या सहयोग किए