संपादकीय

आज हम नि:शब्द हैं, लेकिन निष्क्रिय और निष्प्राण नहीं हैं। टीवी चैनलों पर फटी आंखों से देख रहे हैं। आंसुओं में भीगे शब्दों को भी सुन रहे हैं। हमारी आंखें भी भीगी हैं, लेकिन रुलाई नहीं फूट पा रही है। अभी यकीन पर लगाम लगी है। नियति पर भी भरोसा करना मुश्किल हो रहा है।

यहां आग हवाओं की तरह, घर को तन से दूर कर देती है। जलते पहाड़ के जख्म किस राख में ढूंढोगे। कोटखाई तहसील के फनैल गांव की बाहों में आग के शोलों ने बर्बादी का आलम यूं लिखा कि सात मकानों के जलते बदन के भीतर कोई जिंदा लाश भी बन गई। नुकसान की भरपाई

जब आप यह संपादकीय पढ़ेंगे, तब एक शोधात्मक निष्कर्ष आपके सामने साकार होगा। कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की संख्या 4 लाख को पार कर चुकी होगी अथवा उसके बेहद करीब होगी। हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि कोरोना की सुनामी इतनी प्रलयंकारी साबित होगी और 24  घंटे में लाखों लोग बीमार होंगे।

इनसाफ की डगर पर यह फैसला मात्र एक जघन्य अपराध में संलिप्त व्यक्ति को दंड नहीं दे रहा, बल्कि यह भी बता रहा है कि हमारी आपराधिक जांच के दायरे कितने घिनौने हो सकते हैं। कोटखाई प्रकरण की एक घनी परत हटाते हुए सीबीआई की विशेष अदालत ने, गुडि़या बलात्कार एवं हत्या मामले में अंततः

कोवैक्सीन टीका बनाने वाली कंपनी भारत बायोटैक के चेयरमैन डा. कृष्णा इल्ला ने कहा था कि कोरोना वायरस का टीका पानी से भी सस्ता होगा। पानी की बोतल की कीमत के पांचवें हिस्से से भी कम टीके की कीमत होगी। औसतन पानी की बोतल 20 रुपए की है, लिहाजा टीका मात्र 4 रुपए का होना

अंततः सरकार भी निजी अस्पतालों के द्वार पहुंच रही है और इसकी एक पहल कांगड़ा जिला से शुरू हो गई। बाकायदा आठ निजी अस्पतालों की पचास फीसदी क्षमता का इस्तेमाल इस आपदा में होगा। इससे आने वाले खतरे की सूचना के साथ-साथ यह भी पता चलता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र की लाचारी का आलम

भारत के संविधान में अनुच्छेद 14 से 18 तक समता के अधिकार की व्याख्या है। समानताएं कई स्तरों पर तय की गई हैं। विधि के सामने समानता, राज्य के अधीन विभिन्न सेवाओं में समानता, सामाजिक समता आदि के उल्लेख हैं। संविधान के मुताबिक, देश के सभी नागरिक समान हैं और उन्हें समान अवसर हासिल करने

हिमाचल की नरम हवाओं का घर्षण अब शादियों के शामियाने की खबर लेने लगा और बारात के दस्तावेजों में मेहमानों की सूची पर निगाह रख रहा है। दरअसल कोविड काल ने यह समझा दिया कि यह मसला आचरण की चुनौती सरीखा है, न एक कदम अधिक और न ही गुंजाइश से अधिक लाड़ प्यार। यह

यह राजनीतिक विरोध का वक्त नहीं है। कमोबेश कोरोना टीकाकरण को लेकर सियासी पाले मत खींचिए। टीकाकरण मोदी, गांधी अथवा किसी दल-विशेष का कार्यक्रम नहीं है। टीकाकरण राष्ट्रीय अभियान है और केंद्र सरकार के नेतृत्व में जारी है। ऐसे राष्ट्रीय अभियान कई गंभीर बीमारियों के खिलाफ भी छेड़े गए हैं और अब भी जारी हैं।