संपादकीय

मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री अथवा किसी विपक्षी दल का नेता होना और भ्रामक बयानबाजी करना बेहद आसान है, क्योंकि उसमें कोई जिम्मेदारी या जवाबदेही निहित नहीं है। संविधान में भी गलतबयानी के लिए सजा के प्रावधान नगण्य हैं अथवा कम प्रभावी हैं। जनादेश किसी भी वयस्क नागरिक को विधायक चुन सकता है। चूंकि बहुमत को भी

क्या कबूतरों को उड़ा कर, आसमानी बाज़ का पीछा होगा। धरती का विकार हैं, ऊंचे युद्ध का नाद नहीं। जमीनी हकीकत के सिफर पन्नों पर लिखावट का सौंदर्य भी मजबूर है, क्योंकि यहां जब जरूरत थी तो मेहरबान नींद में थे। कुछ यही हाल है हिमाचल में स्वास्थ्य सेवाओं की तकदीर का और उस पर

बेशक हमारे देश में कोरोना वायरस के मामले घट रहे हैं, लेकिन अभी संक्रमण में स्थिरता के आसार नहीं हैं। कोविड अब भी मौजूद है और स्थिरता की अंतिम स्थिति का इंतज़ार करना पड़ेगा। हालांकि भारत सरकार का विश्लेषण है कि 18 राज्यों में स्थिरता के रुझान स्पष्ट होने लगे हैं, लेकिन कोई दावा नहीं

आपातकाल में अच्छे काम का कोई मॉडल नहीं, परिस्थितियों के सही अर्थ में जो कर गया, वही तो काम का माना जाएगा। कोरोना काल की तमाम नकारात्मक सूचनाओं के बीच जो चेहरे परिस्थितियां बदलने पर आमादा, उन्हें यह वक्त हमेशा याद रखेगा। यह वक्त एक ऐसी कोशिश है, जो पहले नहीं हुई। हर प्रयास का

अमरीकी राष्ट्रपति के चिकित्सा सलाहकार एवं विश्व विख्यात महामारी विशेषज्ञ डा. एंथनी फाउची और विश्व स्वास्थ्य संगठन के बयान एक साथ सार्वजनिक हुए हैं। डा. फाउची का कहना है कि भारत दुनिया में सबसे बड़ा टीका-निर्माता देश है। उसे न केवल अपने टीकाकरण अभियान की गति बढ़ानी चाहिए, बल्कि उन देशों की मदद भी करनी

कोरोना के वीभत्स चरण में कौन कितना आलोच्य हो सकता है, इस पर गौर करते हुए लोकतांत्रिक अधिकारों का विवेचन करेंगे या मानवता के सवालों का अर्थ खोज पाएंगे। यह टेढ़ी फकीरी है, जहां लंगर और लंगोट हार रहे हैं, फिर भी हम उन्मादी बनकर कोरोना को परास्त नहीं कर पाएंगे। यह प्रतिकूलता के बीच

हम अभी तक ‘द लांसेट’ को प्रख्यात वैज्ञानिक और चिकित्सीय शोध पत्रिका मानते थे। अब भी असंख्य लोगों का अभिमत यही होगा, लेकिन हमारी धारणा एकदम चकनाचूर हुई है। बड़ा विस्फोटक मोहभंग हुआ है। हमें एहसास है कि ‘लांसेट’ के अस्तित्व और स्वीकार्यता पर इसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन मोहभंग छोटे-छोटे कंकर-पत्थर होते

कोरोना वायरस की घुटन से जिनकी सांसें उखड़ रही थीं, अब उन्हें जल्द राहत मिल सकती है, क्योंकि एक और ‘संजीवनी’ की तलाश सार्थक हो गई है। रक्षा मंत्रालय के डीआरडीओ के वैज्ञानिकों के प्रयोग और परीक्षण सफल रहे हैं, नतीजतन एक और संपूर्ण स्वदेशी दवा का आविष्कार हुआ है-2 डीजी। यानी 2 डीऑक्सी-डी-ग्लूकोज। चूंकि

प्रतीक्षा में परीक्षा और स्कूल की खामोश घंटियां, भविष्य की चादर ओढ़े शिक्षा के प्रमाण सो रहे हैं। यकायक टन सी आवाज में उद्घाटित घोषणा शिक्षा की सीढि़यां बदल देती है और तब समुद्र सरीखा ज्ञान एक सफा बन जाता है। मैट्रिक की परीक्षा बिना नहाए-धोए अब शिक्षा की गर्दन पर एक नोटिस चस्पां कर