संपादकीय

भारत सरकार आंदोलनकारी किसानों से बातचीत करे या न करे, उनकी मांगों पर सहमति जताए अथवा उन्हें खारिज कर दे, लंबे समय तक किसानों को धरने पर बिठाए रखकर थका दे अथवा मानसिक तौर पर प्रताडि़त करे, लेकिन किसी भी सूरत में सरकार का बड़ा या छोटा मंत्री किसानों को गाली नहीं दे सकता। अपशब्द

गुरु! क्या गज़़ब पारी की शुरुआत की है? पंजाब कांग्रेस के 62 विधायकों, तीन मंत्रियों समेत, के साथ नए प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने अमृतसर के पावन स्वर्ण मंदिर में मत्था टेका, तो अपनी ताकत की नुमाइश की। ‘गुरुÓ अकेला नहीं है। ऐसे विश्लेषण गलत साबित हुए। ओहदे में भी ताकत होती है, लिहाजा

हिमाचल के सियासी गले में उपचुनावों की फांस स्पष्ट होने लगी है और सत्ता के अंतिम डेढ़ साल में यह परिस्थितियां राजनीतिक पार्टियों को अनुशासनहीनता के भंवर तक ले जा रही हैं। प्रदेश कांग्रेस के भीतर मसला उपचुनावों से भी आगे निकल कर आगामी चुनावों के करिश्में ढूंढ रहा है, तो भाजपा को अपनों के

बारिश अब ऋतु से आगे निकल कर नए इम्तिहान की परिपाटी में शामिल हो रही है। यह सूचना भर नहीं कि मौसम बदल गया है या पानी हमारे अस्तित्व पर बरस रहा है। हर साल की अदा में बारिश अब ठिकाने ढूंढने लगी है और पानी खुद को कोसों दूर ले जाने की तरकीबों से

इससे बड़ा झूठ और पाखंड क्या हो सकता है? कोरोना वायरस के चरम दौर में मौतों की हकीकत की अनदेखी और क्या हो सकती है? हम भी मानते हैं कि स्वास्थ्य राज्यों का विषय है। संविधान में ऐसी ही व्यवस्था की गई है, लेकिन यह पत्थर पर उकेरी कोई स्थायी लकीर थोड़ी है! यदि राज्यों

पंजाब कांग्रेस के जलजले का असर हिमाचल में नहीं होगा या कितना होगा, इसको लेकर काफी समानताएं दिखाई दे रही हैं। चुनाव की अगली दहलीज के नजदीक हिमाचल कांग्रेस के बीच, पहले से ही दरारें रही हैं और अब वीरभद्र सिंह की मौत के बाद अरमानों की स्थिति और बदलेगी। दरअसल कांग्रेस अपने गणित में

इजरायल की कंपनी एनएसओ का स्पाईवेयर सिस्टम ‘पेगासस’ एक बार फिर चर्चा में है। इस बार आरोपों और देशों का दायरा अपेक्षाकृत बड़ा है। भारत भी उस सूची में है, लेकिन सरकार ने आज तक स्पष्ट नहीं किया है कि उसने ‘पेगासस’ खरीदा है अथवा नहीं। बहरहाल आरोप हैं कि 300 भारतीय नागरिकों की फोन,

पहली बार व्यापार को विज्ञान की जरूरत पड़ी और इश्तिहार को चमत्कार की। बादल का एक निहायत बिगड़ा हुआ कतरा भी जब जुल्म करता है, तो इस कवायद का कोना पकड़े नहीं पकड़ा जाता। पिछली बारिश ने अपनी वकालत नहीं की, बल्कि जो पानी गुजर गया उसकी कहानी अमृत नहीं। लगभग व्यापार की शून्यता पर

अब किसान आंदोलन का मुद्दा संसद के भीतर भी गूंजेगा और बाहर भी रोष जताएगा। किसान आंदोलन को करीब 8 माह गुज़र चुके हैं। भारत सरकार के साथ किसान प्रतिनिधियों की 11 दौर की बातचीत भी हो चुकी है। एक बार केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी किसानों से संवाद कर चुके हैं। सरकार आंदोलन को