प्रतिबिम्ब

शांता कुमार ‘निज पथ का अविचल पंथी’, किताब की शक्ल में शांता को खोजने के दायरे, दरमियान, दहलीज, दंश, दबाव के दौर और दो टूक की बात को बड़ा कर देती है। अपने ही मंसूबों से मुलाकात करते शांता का भाव क्या और प्रभाव क्या, इस पर असहमत हो सकते हैं, लेकिन अपनी जिंदगी को

शिवा पंचकरण मो.-8894973122 लोकसाहित्य अंतरिक्ष की भांति अनंत है। साथ ही इसमें संभावनाएं भी खूब हैं। आप किसी भी छोर से इसे समझने का प्रयास कर सकते हैं। सरलता से लोक समझ भी आ जाएगा, लेकिन इसके पीछे छिपे विज्ञान के बारे में जानकारी लेते-लेते उम्र बीत जाएगी। कुल मिला कर भिन्न-भिन्न रूप लेकर लोक

अतिथि संपादक : डा. गौतम शर्मा व्यथित हिमाचली लोक साहित्य एवं सांस्कृतिक विवेचन -24 विमर्श के बिंदु -लोक साहित्य की हिमाचली परंपरा -साहित्य से दूर होता हिमाचली लोक -हिमाचली लोक साहित्य का स्वरूप -हिमाचली बोलियों के बंद दरवाजे -हिमाचली बोलियों में साहित्यिक उर्वरता -हिमाचली बोलियों में सामाजिक-सांस्कृतिक नेतृत्व -सांस्कृतिक विरासत के लेखकीय सरोकार -हिमाचली इतिहास

साधुराम दर्शक ने साहित्य की विविध विधाओं में सृजन किया  है। नब्बे वर्ष की उम्र में भी उनकी  सृजनशीलता बनी हुई है।  इसकी सुखद परिणति उनकी नव्यतम सद्य औपन्यासिक कृति ‘बादलों से ढका आकाश’ है। यह  व्यापक फलक का उपन्यास है। इसमें जमींदारों द्वारा शोषण, उत्पीड़न, दलितों-निर्धनों के साथ निर्ममतापूर्ण व्यवहार, जमींदारों द्वारा नाजायज भूमि

डा. रवींद्र कुमार ठाकुर मो.-9418638100 मेरे विचार में लोकसाहित्य की विधाओं में सबसे प्राचीनतम विधा लोक कहावतें हैं। जब लोक मानस ने अपने प्रारंभिक समय में बोलना सीखा और वह अपने दिल की बात एक-दूसरे तक संप्रेषित करने लगा और उसमें पारंगत होने लगा तो उसने अपने जीवन के अर्जित अनुभवों को चटपटे सारगर्भित ढंग

अतिथि संपादक : डा. गौतम शर्मा व्यथित मो.- 9418130860 विमर्श के बिंदु हिमाचली लोक साहित्य एवं सांस्कृतिक विवेचन -23 -लोक साहित्य की हिमाचली परंपरा -साहित्य से दूर होता हिमाचली लोक -हिमाचली लोक साहित्य का स्वरूप -हिमाचली बोलियों के बंद दरवाजे -हिमाचली बोलियों में साहित्यिक उर्वरता -हिमाचली बोलियों में सामाजिक-सांस्कृतिक नेतृत्व -सांस्कृतिक विरासत के लेखकीय सरोकार

प्रभात शर्मा, मो.-9418466233 हिमाचल प्रदेश के जिला चंबा की पांगी घाटी का प्राकृतिक सौंदर्य एवं समृद्ध लोक संस्कृति व देव संस्कृति परंपराएं हिमाचल के अन्य भागों से कुछ भिन्नता लिए हैं। यह प्रदेश की सबसे दुर्गम घाटी है। सन् 1971 में इसे तहसील व उपमंडल का दर्जा मिला था। इससे पूर्व यह चंबा की उपतहसील

क्या आप न्यूंद्रा, पाखी, घड़ोह्ली, जुंगड़ा, खालह्डू, त्रयांगल, छिकड़ी, पातरी, खुरली, खंदोलू, उखल, चोरिंग, पाथा, भरनी, हुक्का, भ्याई पूजन, कड़याठी, मांजरी, बिन्ने, शहनाई, चक्की और ज्वारी आदि हिमाचली चीजों, उपकरणों, रस्मों, विधियों से परिचित हैं? जवाब शायद यह होगा कि पुरानी पीढ़ी तो संभवतः इनसे परिचित होगी, लेकिन युवा पीढ़ी में बिरले ही युवा होंगे

‘मन मंथन’,  ‘भैरों कभी नहीं मरा’ और ‘गीता बोल रही हूं’ उपन्यासों के बाद ‘एक थी रानी खैरीगढ़ी’ गंगा राम राजी का चौथा उपन्यास है। यह ऐतिहासिक उपन्यास भारतीय स्वतंत्रता-आंदोलन में ब्रिटिश कालीन हिंदुस्तान के एक छोटे से राज्य मंडी के योगदान की कहानी को बहुत सुंदर ढंग से सामने ले आता है। बीसवीं सदी