विचार

भारत ने ट्रिप्स प्रावधानों में छूट की गुहार लगाई है, किंतु कई देश अड़ंगा डाल रहे हैं। ऐसे में सरकार को ये अनिवार्य लाइसेंस तुरंत देने चाहिएं ताकि महामारी से त्रस्त जनता को कंपनियों के शोषण से बचाया जा सके… आज कोरोना वायरस, जिसे चीनी या वुहान वायरस भी कहा जा रहा है, ने लगभग

हमारे सुपुत्र बरखुरदार चिरंजीत कुलभूषण उर्फ बंटी साहब सरकार से कहां कम हैं? जो लक्ष्य सरकार एक पंचवर्षीय योजना में नहीं प्राप्त कर पाती है, भला वे क्यों पांच वर्ष में दसवीं कक्षा पास कर लेते। फख्र का विषय तो यह है कि वे इस बार छठी बार परीक्षा देने के बाद भी वही फेल

देश इस समय वैश्विक महामारी कोरोना के कारण संकट में है। इस समय हर सत्ताधारी और राजनेता, ये चाहे किसी भी राजनीतिक दल के क्यों न हों, इन सभी को कोरोना के किसी भी मुद्दे पर ओछी राजनीति से बचते हुए देशहित और जनहित के बारे में सोचना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए

कोरोना के खिलाफ मानसिक उथल-पुथल और कर्फ्यू बंदिशों के परिदृश्य में हालात का मुआयना गिड़गिड़ाने लगा है। समझ से परे हालात पर हाथ बांधे खड़ा नहीं हुआ जा सकता है, लिहाजा नई चिंताओं के साथ सूबेदारी, पहरेदारी तथा कारगुजारी बदल रही है। इसी जवाबदेही से निकला डिमांड चार्टर कल तक जिसे महसूस नहीं कर पाया,

मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री अथवा किसी विपक्षी दल का नेता होना और भ्रामक बयानबाजी करना बेहद आसान है, क्योंकि उसमें कोई जिम्मेदारी या जवाबदेही निहित नहीं है। संविधान में भी गलतबयानी के लिए सजा के प्रावधान नगण्य हैं अथवा कम प्रभावी हैं। जनादेश किसी भी वयस्क नागरिक को विधायक चुन सकता है। चूंकि बहुमत को भी

जीवन में हम अक्सर देखते हैं कि हमारे ज्यादातर रिश्तों में मिठास नहीं रही, गर्मी नहीं रही और वो धीरे-धीरे सूखते जा रहे हैं। रिश्ते तो ऐसे होने चाहिएं जो सार्थक हों, जिनमें खुशी मिले और परिपूर्णता महसूस हो। सभी तरह की खोजों का नतीजा यह है कि जिन रिश्तों में बातचीत चलती रहती है,

आज घरों में कैद विद्यार्थी सिर पर हाथ लिए बैठने और अपने भविष्य की चिंता करने के अलावा किसी अन्य स्थिति में नजर नहीं आ रहा है। मानो मानसिक दबाव, तनाव, चिंता और कोरोना की भयंकर लहर सब कुछ नष्ट करने को आतुर सी हो, ऐसा प्रतीत होता है। लेकिन इन युवा विद्यार्थियों को चिंता

समाचारों के अनुसार गंगा नदी के पवित्र जल में 50 शव बहते हुए पाए गए हैं। यह सही है कि दाह या दफन संस्कार के लिए परिवार के सदस्यों को 5 से 6 घंटे तक श्मशान या  कब्रिस्तान में इंतजार करना पड़ता है और शवों को जलाने के लिए सूखी लकड़ी तथा खाली जमीन की

क्या कबूतरों को उड़ा कर, आसमानी बाज़ का पीछा होगा। धरती का विकार हैं, ऊंचे युद्ध का नाद नहीं। जमीनी हकीकत के सिफर पन्नों पर लिखावट का सौंदर्य भी मजबूर है, क्योंकि यहां जब जरूरत थी तो मेहरबान नींद में थे। कुछ यही हाल है हिमाचल में स्वास्थ्य सेवाओं की तकदीर का और उस पर