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अक्षय तृतीया वैशाख शुक्ल तृतीया को कहा जाता है। वैदिक कैलेंडर के चार सर्वाधिक शुभ दिनों में से यह एक मानी गई है। अक्षय से तात्पर्य है जिसका कभी क्षय न हो अर्थात जो कभी नष्ट नहीं होता। भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के वृंदावन में ठाकुर जी के चरण दर्शन इसी दिन होते हैं।

-गतांक से आगे… गृध्र-रूपा शिवा-रूपा चक्रिणी चक्र-रूप-धृक। लिंगाभिधायिनी लिंग-प्रिया लिंग-निवासिनी।। 121।। लिंगस्था लिंगनी लिंग-रूपिणी लिंग-सुन्दरी। लिंग-गीतिमहा-प्रीता भग-गीतिर्महा-सुखा।। 122।। लिंग-नाम-सदानंदा भग-नाम सदा-रतिः। लिंग-माला-कंठ-भूषा भग-माला-विभूषणा।। 123।। भग-लिंगामृत-प्रीता भग-लिंगामृतात्मिका। भग-लिंगार्चन-प्रीता भग-लिंग-स्वरूपिणी।। 124।। भग-लिंग-स्वरूपा च भग-लिंग-सुखावहा। स्वयम्भू-कुसुम-प्रीता स्वयम्भू-कुसुमार्चिता।। 125।। स्वयम्भू-पुष्प-प्राणा स्वयम्भू-कुसुमोत्थिता। स्वयम्भू-कुसुम-स्नाता स्वयम्भू-पुष्प-तर्पिता।। 126।। स्वयम्भू-पुष्प-घटिता स्वयम्भू-पुष्प-धारिणी। स्वयम्भू-पुष्प-तिलका स्वयम्भू-पुष्प-चर्चिता।। 127।। स्वयम्भू-पुष्प-निरता स्वयम्भू-कुसुम-ग्रहा। स्वयम्भू-पुष्प-यज्ञांगा स्वयम्भू-कुसुमात्मिका।। 128।। स्वयम्भू-पुष्प-निचिता स्वयम्भू-कुसुम-प्रिया। स्वयम्भू-कुसुमादान-लालसोन्मत्त-मानसा।। 129।। स्वयम्भू-कुसुमानन्द-लहरी-स्निग्ध

राजस्थान वैसे तोफा मंदिर का निर्माण स्वयं परशुराम ने अपने फरसे से चट्टान को काटकर किया था। कहा जाता है कि हजारों बार इस धरती से क्षत्रियों का नाश करने वाले परशुराम के पास अद्भुत शक्ति यहीं की देन है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव के द्वारा दिए गए परशु(फरसा) के कारण ही इनका

राजस्थान अरावली की सुरम्य पहाडि़यों में स्थित परशुराम महादेव गुफा मंदिर का निर्माण स्वयं परशुराम ने अपने फरसे से चट्टान को काटकर किया था। इस गुफा मंदिर तक जाने के लिए 500 सीढि़यों का सफर तय करना पड़ता है। इस गुफा मंदिर के अंदर एक स्वयंभू शिवलिंग है… हमारे देश में अनगिनत धार्मिक स्थल हैं,

स्वामी विवेकानंद गतांक से आगे… अब केवल यूरोप ही नहीं वरन समस्त भारतवर्ष इस कील विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक पाल डायसन को जानता है। मैंने अमरीका और यूरोप में संस्कृत के कई प्राध्यापकों को देखा है। उनमें से अनेक वेदांत की ओर आकृष्ट हैं। मैं उनके पांडित्य एवं निःस्वार्थ कार्य में जीवनोत्सर्ग को देखकर

वास्तव में ध्यान कोई क्रिया नहीं, यह कुछ भी न करने की कला है। ध्यान में विश्रांति आपके द्धारा ली गई गहनतम निद्रा से भी गहन होती है, क्योंकि ध्यान से आप सभी कामनाओं से परे चले जाते हैं । यह दिमाग को इतनी शांति प्रदान करता है और यह सारे शरीर और मन रूपी

ओशो एक सादगी भरा व्यक्ति जान लेता है कि प्रसन्नता जीवन का स्वभाव है। प्रसन्न रहने के लिए किन्हीं कारणों की जरूरत नहीं होती। बस तुम प्रसन्न रह सकते हो। केवल इसीलिए कि तुम जीवित हो। जीवन प्रसन्नता है, जीवन आनंद है, लेकिन ऐसा संभव होता है केवल एक सहज सादे व्यक्ति के लिए ही।

सद्गुरु  जग्गी वासुदेव अपने यहां एक महिला संत हुई हैं। क्योंकि वह बोलती नहीं थी, अतः कोई नहीं जानता था कि वह कहां से आई थी। लेकिन उनके चेहरे को देखकर लगता था कि वह नेपाल से आई थी। वह दक्षिणी भारत के छोर पर बसे शहर कन्याकुमारी में रहती थी। वह अकसर सड़कों पर

हिमाचल देवी-देवताओं की भूमि है, जहां पर आपको थोड़ी ही दूरी पर किसी न किसी देवता का मंदिर देखने को मिलेगा और उसका अपना ही इतिहास और वर्चस्व है। ऐसी ही एक देवी धौलाधार की पहाडि़यों की खूबसूरत धार नड्डी के बल्ह में विराजमान है। गुणा माता की महिमा से स्थानीय लोग भलीभांति परिचित हैं,