परिस्थितियां बदलने के लिए

By: May 12th, 2021 12:05 am

आपातकाल में अच्छे काम का कोई मॉडल नहीं, परिस्थितियों के सही अर्थ में जो कर गया, वही तो काम का माना जाएगा। कोरोना काल की तमाम नकारात्मक सूचनाओं के बीच जो चेहरे परिस्थितियां बदलने पर आमादा, उन्हें यह वक्त हमेशा याद रखेगा। यह वक्त एक ऐसी कोशिश है, जो पहले नहीं हुई। हर प्रयास का नतीजा क्या होगा कोई नहीं जानता, क्योंकि मेहनत की कोई मुरौवत नहीं बची। हम अपने आसपास कई ऐसे चेहरे देख सकते हैं, जो घर के तमाम झंझावात से दूर निकल कर कोरोना को मात देने का जोखिम सिर पर उठाकर चले हैं। कुल्लू की कृष्णा के लिए पति और बेटे की बीमारी कोई बंधन नहीं, लिहाजा वह इस वक्त को कोविड वार्ड को अर्पित करके परिस्थितियां पलटना चाहती हैं। दौलतपुर चौक के डा. राजीव कोरोना के ग्यारह हजार सैंपल लेकर यह साबित कर रहे हैं कि कर्म का यह दौर एक नई गीता लिखेगा। इस भीड़ में कोई अर्जुन अकेला नहीं रहेगा क्योंकि इस युद्ध में बेटियां भी आगे चल रही हैं। ऐसी कितनी महिला डाक्टर हैं जो अपने बच्चों को किसी न किसी के हवाले करके रोज पीपीई किट के भीतर अनूठी मां बन रही हैं।

 हर दिन की मशक्कत में कई किरदार ऐसे भी हैं, जो हमसे कहीं ऊपर खुदा जैसी बात करते हैं। आखिर वे भी तो हाथ ही हैं, जो अस्पतालों के वार्ड में कोरोना संक्रमितों की नब्ज पर ही नहीं उनके जीवन से स्पर्श करते हैं। हर दिन दौड़ती सैकड़ों एंबुलेंस के भीतर चालक व अन्य स्टॉफ किसे ढो रहा है। उन्हें मालूम है कि वे सांसें ढो रहे हैं और उनके हर मुकाम पर एक जिंदगी जीत सकती है। यही है भावना जो कोरोना काल में भी हमारे जैसे लोगों के भीतर कइयों को नायक की तरह पहचान रही है, तो दूसरी ओर आपदा में अवसर की निर्लज्ज हकीकत भी है। हैं कई कैंकड़ा वृत्ति के लोग जो भ्रष्टाचार के रास्तों पर कोरोना के दिए जख्म बेच रहे हैं। जमाखोरी, घूसखोरी और उपभोक्ताओं की जरूरतों का मजाक उड़ाने वाले भी तो हैं, जो कीमतों में फर्जी उछाल लाकर या बंदिशों के पर्दे हटाकर अपना इमान बेच रहे हैं। खेत में उत्पादक अपनी सब्जियों पर लागत वसूल नहीं पाया, लेकिन बाजार में लुट रहा है मासूम उपभोक्ता। हर हिदायत की वसूली में बाजार आंखें दिखा रहा, इसलिए दवाई से दुआ तक महंगी है इस कफन में।

कोविड काल ने कहीं सिखाया, कहीं रुलाया, लेकिन कुछ ऐसे लोग भी सामने आते रहे जो अभिशप्त राहों पर तिलिस्म दिखाते रहे। कोविड सेंटर से बच कर घर पहुंचे जसूर के एक व्यक्ति पर क्या गुजरी होगी, जब एंबुलेंस के संचालक ने उसे सड़क पर पटक दिया होगा, लेकिन रहम के उन फाहों का स्पर्श भी तो मिलता है जब बद्दी के युवाओं ने जम्मू निवासी की मौत को अपने कर्त्तव्य के कंधे देते हुए अंतिम संस्कार कर दिया। दवा निर्माता संघ 13 लाख के आक्सीजन सिलेंडर और 225 बिस्तर उपलब्ध कराता है, तो कराहती व्यवस्था की पीठ सीधी हो जाती है। ये नए खतरे, नए अभाव हैं-इस बस्ती के बदलते प्रभाव में कहीं तो दीया जलाना पड़ेगा। हम व्यथित हो सकते हैं, खबरें आहत कर सकती हैं। विपक्ष के लिए सूचनाओं के विद्रोह में खड़े होने का अवसर है या इस तूफान में एक लौ जलाने की कोई भूमिका तराशी जा सकती है। कहना न होगा कि कांग्रेस को भी इस वक्त की संवेदना में देखा जाएगा और हर योगदान की तहरीर होगी, चाहे सुधीर शर्मा जैसे किसी नेता के घर में कोविड सहायता के इंतजाम हों या पार्टी के माध्यम से राज्य के बंदोबस्त में भूमिका हो। ऐसे में कांग्रेस की कोरोना रिलीफ वर्क कमेटी सिर्फ एक घोषणा नहीं, दायित्व की मचान हो सकती है।