पीड़ादायक है ‘पहल’ पत्रिका का बंद हो जाना

By: May 9th, 2021 12:04 am

साहित्यिक विमर्श

राजेंद्र राजन मो.-8219158269

‘पहल’ का 125वां अंक अपने प्रकाशन की 47 साल की यात्रा तय करने के बाद अंतिम अंक के रूप में पाठकों के हाथों में आया है। पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन इस अंक में अपने लंबे संपादकीय में लिखते है ‘हर चीज़ की एक आयु होती है, जबकि हम अपनी सांसों से अधिक जी चुके हैं। ‘पहल’ को ऐसी पत्रिका होने पर गर्व है कि उसकी गाड़ी को एक संपादक नहीं अपितु एक समूह मिलजुल कर चलाता रहा। यह सही है कि पहल एक आज़ाद ख्याल पत्रिका रही और इसे यदाकदा तटस्थता और कठोरता का पालन करना पड़ा। नए जमाने के शत्रुओं की पहचान भी जरूरी थी। यहां शत्रुओं का अर्थ उन प्रगति विरोधी, सांप्रदायिक और तानाशाह शक्तियों और घरानों से है जिनसे ‘पहल’ को करीब आधी सदी तक मुठभेड़ करनी पड़ी।’ किसी भी साहित्यिक पत्रिका के मयार को आंकने का यह पैमाना कतई नहीं हो सकता कि उसकी सरकुलेशन सैंकड़ों में है या हजारों में या लाखों में। ‘पहल’ की एक डेडीकैटिड प्रसार संख्या अंत तक बनी रही। यानी चंद हजार ऐसे पाठक जो दीवानगी और पागलपन की हद तक ‘पहल’ से प्यार करते रहे।

इसलिए क्योंकि पत्रिका की समृद्ध सामग्री यानी कंटेंट ही इसकी रूहानी शक्ति थी। ‘पहल’ एक विचार प्रधान पत्रिका रही और इसमें छपने वाले विमर्शपूर्ण लेखों की सालों साल चर्चा होती रही। कहानी, कविताओं, शोधपरक लेखों, संस्मरणों, फिल्मों या फिर उपन्यासों पर लेख हों या रचनाएं, किसी भी विषय पर सामग्री का चयन इतना उत्कृष्ट व दमदार कि वह लंबे वक्त तक चर्चा का विषय बन जाएं। प्रेमचंद ने 1936 में लिखा था ‘हमारी साहित्यिक रुचि बड़ी तेजी से बदलती जा रही है।’ अब साहित्य केवल मन बहलाव की चीज़ नहीं है। मनोरंजन के सिवा उसका और भी उद्देश्य है…। वह ‘और’ उद्देश्य 70 या 80 के दशक में ‘पहल’ सरीखी पत्रिकाओं ने पूरा किया। दूसरे शब्दों में सामाजिक सरोकारों, विचार को जीवित रखने और एक मूक साहित्यिक क्रांति अथवा आंदोलन के माध्यम से लोगों को विध्वंसकारी, फासीवादी और समाज व देश को तोड़ने वाली शक्तियों के विरुद्ध चेतना और जागरूकता पैदा करना। सब जानते हैं कि ‘पहल’ पूर्व घोषित विचारधारा के तहत छपने वाली पत्रिका थी। यानी मार्क्सवादी, प्रगतिशील, जनवादी और मानवीय दृष्टिकोण का एक ऐसा आईना जिसमें हम राजनीति, सत्ता, भ्रष्ट तंत्र, शोषण आदि के विद्रूप व भयावह चेहरे को आसानी से देख या पढ़ सकते थे। हंस के संपादक राजेंद्र यादव की ही तर्ज पर ‘पहल’ की संपादक मंडली ने भी देशभर में युवा लेखकों की खोज़ की। जेएनयू अथवा अन्य विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर रहे युवा प्रतिभाशाली लेखकों की नई पीढ़ी को सृजनात्मक अभिव्यक्ति के लिए माकूल मंच प्रदान किया। करीब 1996 के आसपास एस. आर. हरनोट की एक कहानी पहली दफा ‘पहल’ में छपी, ‘बिल्लियां’ बतियाती हैं शीर्षक से। ज्ञानरंजनजी ने मुझे बताया था कि कैसे उन्होंने एक बेहतरीन कथानक की भाषा व शिल्प को कई बार संवारने के लिए हरनोट जी से प्रयास करवाए  थे।

इससे पूर्व जब मैं और डी. के. गुप्ता हरनोट की कमजोर कहानियों पर तीखी टिप्पणियां करते थे तो वह हमसे नाराज हो जाते थे। लेकिन ‘पहल’ में छपने के बाद ही सही मायने में हरनोट एक सशक्त कथाकार के रूप में सामने आए। इधर के कुछ अंकों में हिंदूवादी विचारधारा, गांधी की विचारधारा आदि पर जो लेख पढ़ने को मिले वे पाठकों को चकित करते रहे। सूरज पालीवाल के ज़रिए हिंदी के समकालीन चुनिंदा व चर्चित उपन्यासों पर कई सालों तक चली श्रृंखला को पढ़ने के बाद यह अनुभूति होती थी कि काश तुरंत कहीं से वे उपन्यास पढ़ने को मिल जाएं। पिछले कुछ वर्षों से पहल ने विज्ञापन छापने बंद कर दिए थे और यह पत्रिका ‘क्राउड फंडिंग’ अर्थात मित्रों, पाठकों अथवा लेखकों के आर्थिक सहयोग से छपती रही।

निश्चित रूप से पहल के प्रति यह उनका भावनात्मक जुड़ाव था। ‘पहल’ ने ‘पहल सम्मान’ की शुरुआत भी की थी। यह सम्मान जिस लेखक को दिया जाता था उसी के ही शहर में भव्य आयोजन होता था। ‘पहल’ की गोष्ठियों और पुरस्कार समारोहों में देशभर से लेखक और पाठक खुद अपना किराया खर्च कर पहुंचते थे। यहां तक कि उस शहर में रहने व खाने-पीने का प्रबंध भी खुद ही करते थे। यह भावना कामरेड जज्बे का प्रतीक बन गई। इस पत्रिका की लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने का परिणाम यह हुआ कि ज्ञानरंजन जी खुद कहानी लेखन से दूर हो गए। ‘पहल’ के अंतिम अंक में संपादक ने कुछ महत्त्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं जिन्हें यहां उद्धृत करना प्रासंगिक प्रतीत हो रहा है, ‘हमने संपादकीय घोषणाएं नहीं कीं और उसके अतिरेक से बचते रहे। 50 साल में कोई फतवा हमारा नहीं है। हमने रचनाएं आदर, प्यार, आग्रह से मांगीं और उन्हें प्रस्तुत किया। हमारा ढांचा शिथिल पड़ रहा है क्योंकि यह महामारी जाने से इन्कार नहीं कर रही है। इसने हमारे ताने बाने को उलट-पुलट दिया है।

यह महामारी चंचल है, बार-बार अपने को बदलती है, इसने सत्ताओं को भीतरी तौर पर खुश और मन माफिक बनाया है। हमारे कई साथी जो प्रकाश स्तंभ की तरह थे, इसकी चपेट में चले गए।

कुछ को वर्तमान अंधी सत्ता ने मौन और निष्क्रिय कर दिया। हम मुखौटे उतारते रहे और अब प्रतिदिन नए मुखौटे तैयार हो रहे हैं। ऐसे वक्त में हमे आपसे विदा ले रहे हैं’। प्रस्तुत अंक के दूसरे संपादक राजकुमार केसवानी लिखते हैं, ‘पहल’ ज्ञानरंजन की एक लंबी कहानी है, जिसके पात्र अनेकानेक कवि, लेखक, विचारक हैं। इनमें से अधिकांश ने अपने-अपने कारनामों से अपनी एक अलग पहचान बनाई। इस पहचान के साथ-साथ ‘पहल’ की पहचान भी जुड़ती और बढ़ती रही है।

इस कहानी का अंत होता है, लेकिन कहानी कभी ़खत्म नहीं होती। मनुष्य का पुनर्जन्म का सिद्धांत अब तक मात्र एक विचार है लेकिन कहानी के संदर्भ में यह एक स्थापित सत्य है। हर पुरानी कहानी नए संदर्भों में, नए देश-काल में, नए नाम और नए रंग-रूप में जन्म लेती रहती है। किसी कुम्हार के घड़े की तरह। मिट्टी वही लेकिन टूटकर बिखरकर भी बन जाती है कभी घड़ा, कभी कटोरा और कभी प्याला।’’ पाठकों के मन में ‘पहल’ के बंद होने की पीड़ा लंबे वक्त तक वैसे ही बनी रहेगी जैसे गुजरे ज़माने की ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’ या फिर ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ आदि खूब लोकप्रिय पत्रिकाओं के बंद होने पर लाखों पाठकों के दिल रोए थे।