बिना नहाए परीक्षा

By: May 10th, 2021 12:02 am

प्रतीक्षा में परीक्षा और स्कूल की खामोश घंटियां, भविष्य की चादर ओढ़े शिक्षा के प्रमाण सो रहे हैं। यकायक टन सी आवाज में उद्घाटित घोषणा शिक्षा की सीढि़यां बदल देती है और तब समुद्र सरीखा ज्ञान एक सफा बन जाता है। मैट्रिक की परीक्षा बिना नहाए-धोए अब शिक्षा की गर्दन पर एक नोटिस चस्पां कर देती है और इस तरह साल भर का कोरोना काल बच्चों के संघर्ष को ऐसे पुरस्कृत कर देता है, जिसे कबूल करना गुनाह है या इससे बचना मना है। दीवारों के भीतर अटके ज्ञान का मूल्यांकन एक फेहरिस्त तो बना सकता है, लेकिन सफलता की सूचियों में अब कौन क्रांति लाएगा। शिक्षा भी एसओपी बन गई और वक्त ने अपने असहाय पन्नों पर एक उपाय जोड़ दिया। व्यक्तित्व निर्माण की कितनी ईंटें खिसक जाएंगी या पर्दे में शिक्षक की आबरू फंस जाएगी, किसने सोचा। शिक्षक तो लगातार कसरतें करता रहा और अपनी साधना में छात्र समुदाय भी जुटा रहा, लेकिन इस दरिया को पार करने में दोनों वर्ग कीचड़ में धंसे हैं।

 हम शारीरिक और बौद्धिक कसौटियों पर कोरोना का मुकाबला कर रहे हैं, लेकिन मानसिक विकार की तलहटी पर बिखरी शिक्षा के हर पात्र के लिए यह समय जिंदगी की ऐसी क्षति से सराबोर है, जिसे परखने, पलटने व पूर्व स्थिति में लाने की कहीं कोई गुंजाइश नहीं। यह दसवीं कक्षा से ग्यारहवीं का सीधा तिलक लगाकर भी आत्मग्लानि का बोध भर रहा है, तो यह कैरियर के युग का घाटा है। हम अपनी ही एक पीढ़ी की महत्त्वाकांक्षा को रौंदने को मजबूर हुए, इससे घातक पश्चाताप और क्या होगा। जिन्होंने देश के लिए इंजीनियर बनने की पिछले कई वर्षों से ठानी है या जो सेहत के मैदान पर योद्धा अंगीकार होने का स्वप्न पाले हैं, उनके भविष्य के आगे प्रश्नचिन्हों की फिरौती मांग रहा कोरोना काल, न जाने कहां तक हमें अभिशप्त करेगा। आश्चर्य के कोई मानवीय मानक गढ़े जाएंगे, तो इस दौर के बचपन से निकल कर जो शिशु स्कूल की अंगुली पकड़ रहे थे, उन्हें बार-बार देखा जाएगा। बाल्यावस्था में ऑनलाइन पढ़ाई का सबूत तो बचपन बन सकता है, लेकिन उसके साथ संवादहीनता के अनूठे प्रश्नों का उत्तर कौन बताएगा। तमाम गृहिणियां या पढ़ना सीख रहे बच्चों की माताएं, इस वक्त की धुंध से चाहे छोटा सा आसमान भी छीन लें, उन्हें मानवता प्रणाम करेगी। औपचारिक शिक्षा के लिए घर में चटाई बिछा कर, जो औरत अपने नन्हों की परवरिश कर रही है, वही कल संपूर्ण शिक्षा की कमाई होगी।

 कोरोना काल का सबसे बड़ा गुरु घर में बैठा अपनी ही औलाद के तर्क, तेवर और तन्मयता का साक्षी है। मीलों दूर बैठा शिक्षक अगर यह समझता है कि रोज उसकी क्लास में पसीना बह रहा है, तो यह अभिभावकों में खास तौर पर किसी न किसी मां का श्रम है। छोटे बच्चों की माताओं को यह दौर नहीं भूल सकता, क्योंकि वे मां की भूमिका का विस्तार करते हुए कभी चिकित्सकीय चुनौतियों के बीच अपनी पलकों की पालकी में उन्हें संभाल रही हैं, तो कभी एक शिक्षक की तरह उनके व्यक्तित्व का सांचा बना रही हैं। ऐसे में पांचवीं कक्षा तक के बच्चों की माताओं के प्रति समाज की कृतज्ञता के अलावा शिक्षा विभाग को भी ऐसे योगदान को सम्मानित करना होगा। शिक्षा अपने खरे-खोटे अनुभव के संक्रमण काल से गुजर रही है। ऐसे में स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों के औचित्य पर छात्र व अभिभावक समुदाय की सोच बदल रही है। पढ़ाई के अनौपचारिक ढर्रे और सिकुड़ती कमाई ने पुनः सरकारी व निजी स्कूलों में अंतर पैदा किया है। हमीरपुर में 2166 छात्र निजी स्कूल छोड़कर सरकारी परिसर में प्रवेश ले रहे हैं, तो यह ट्रेंड पूरे हिमाचल में शिक्षा के प्रति आस्था बदल रहा है। शिक्षा विभाग इस दौर में फीस को लेकर प्रासंगिक दिखाई दे रहा है, तो इस अवसर में आगे चलकर बहुत कुछ पाने और बहुत कुछ संवारने की आवश्यकता रहेगी।