सहयोग-सहमति का दौर

By: May 11th, 2021 12:05 am

कोरोना के वीभत्स चरण में कौन कितना आलोच्य हो सकता है, इस पर गौर करते हुए लोकतांत्रिक अधिकारों का विवेचन करेंगे या मानवता के सवालों का अर्थ खोज पाएंगे। यह टेढ़ी फकीरी है, जहां लंगर और लंगोट हार रहे हैं, फिर भी हम उन्मादी बनकर कोरोना को परास्त नहीं कर पाएंगे। यह प्रतिकूलता के बीच इनसानी संयम का संघर्ष साबित होगा, अतः आलोचना की अनिवार्यता भी यह हिदायत दे रही है कि कुछ कदम साहस, विश्वास, सहयोग व सहमति से लिए जाएं। हिमाचल में एक वायरल वीडियो का तहलका किसके कान खोल रहा है या खोल पाएगा, यह तो कहा नहीं जा सकता, लेकिन धमकियों का यह अंदाज गैर जरूरी है। वीडियो में जिस तरह की भाषा से चिकित्सा अधिकारी को डराया-धमकाया जा रहा है, उसे कानूनी व वर्तमान स्थिति के अनुरूप नहीं माना जा सकता है।

 बेशक अव्यवस्था की चीख सुनकर संवेदशीलता की पुकार आक्रोश में आ सकती है या जन पीड़ा का संवेग सारे बंधन तोड़कर मुखातिब होना चाहेगा, फिर भी यह वक्त धीमे चलने का है, दौड़ने-भागने का नहीं। कुछ इसी तरह के हाल सोशल मीडिया के भी हो सकते हैं, जहां अधूरी जानकारियों की गति से भ्रम और आलोचनाओं का माहौल तीव्रता से फैल रहा है। पिछले दिनों डोनाल्ड ट्रंप और अमिताभ बच्चन के नाम से हासिल फर्जी प्रवेश पत्रों पर फजीहत किसकी हुई। व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने के अवसर बढ़ा कर दखेंगे, तो सरकार का हर फैसला नापसंद किया जा सकता है, लेकिन यह कोरोना काल है इसलिए पहले से भांप कर भी तो दीवारें खड़ी नहीं की जा सकतीं। जनता के लिए सबसे बड़ी राहत तो सुशासन की कसौटी पर होगी और इसके लिए सरकार को हर फीडबैक को सकारात्मक रूप से लेना होगा, लेकिन प्रदेश का हर नागरिक या नेताओं की कोई टोली ही तो सलाहकार नहीं हो सकती है। देखा जा रहा है कि हर दिन कोई न कोई एक्सपर्ट पैनल या तो सोशल मीडिया के जरिए, कोरोना के खिलाफ प्रयत्न की खिल्ली उड़ा रहा होता है या कोई वरिष्ठ नेता बिना किसी प्रशासनिक ज्ञान के सलाह के दंड पेल रहा होता है। नाजुक दौर में डिजिटल मीडिया भी अपनी आंखों में नजारे भरने की कोशिश में यह भूल न कर दे कि कहीं, वायरल वीडियो का प्रसारण अविश्वास का प्रलाप बन जाए।

 ऐसे में सरकार का यह दायित्व है कि सूचनाओं के तत्त्व में स्वास्थ्य संबंधी बुलेटिन तैयार करवाए। जनता सुनना चाहती है कि प्रदेश किस तरह संक्रमण के खिलाफ बंदोबस्त कर रहा है, यही वजह है कि कर्फ्यू की घोषणा को नागरिकों ने अपने जीवन का आदर्श बनाया और अब लॉकडाउन सरीखे प्रतिबंधों पर भी सहमति के उद्गार सामने हैं, लेकिन अपने ही किंतु-परंतु के बीच सरकारी आदेश भ्रम पैदा करते हैं। कुछ जिलाधीश मीडिया से नियमित संबोधित हो कर तमाम जानकारियों से जनता की क्षुधा शांत करने में अवश्य ही सफल हुए हैं। मौजूदा हालात को देखते हुए जनता ने कर्फ्यू की हर परिभाषा का सम्मान किया है और यह किसी भी सरकार के लिए सुशासन की अहम कड़ी बन रही है। ऐसे में सुझावों का पुलिंदा बनाने के बजाय फैसलों पर अमल करना होगा, जबकि दूसरी ओर प्रशासनिक हेल्पलाइन को जवाबदेह होना पड़ेगा। हमारा मानना है कि रिटायर्ड नेताओं को भी नित नए सुझाव देने के बजाय सामाजिक असमंजस को दूर करने का नेतृत्व करना होगा। कोरोना के लिए कर्फ्यू दरअसल वैयक्तिक अनुशासन का प्रबंधन व संयम की सीमा रेखा सरीखा कर्त्तव्य है और इसके प्रति हम सभी जवाबदेह हैं। आश्चर्य यह कि वर्तमान परिस्थितियों की सीमित परिधि में भी, आवश्यक वस्तुओं की बिक्री में कुछ लोग अपनी नैतिक जिम्मेदारी भूल रहे हैं। अनावश्यक रूप से फल-सब्जियों और किराने के दामों में उछाल की वजह बाजार की गंदगी है और इस पर नियंत्रण होना ही चाहिए।