सुस्त टीकाकरण की हकीकत

By: May 12th, 2021 12:05 am

अमरीकी राष्ट्रपति के चिकित्सा सलाहकार एवं विश्व विख्यात महामारी विशेषज्ञ डा. एंथनी फाउची और विश्व स्वास्थ्य संगठन के बयान एक साथ सार्वजनिक हुए हैं। डा. फाउची का कहना है कि भारत दुनिया में सबसे बड़ा टीका-निर्माता देश है। उसे न केवल अपने टीकाकरण अभियान की गति बढ़ानी चाहिए, बल्कि उन देशों की मदद भी करनी चाहिए, जो कोविड टीके बनाने में अक्षम हैं। डा. फाउची ने भारत में राष्ट्रीय लॉकडाउन की पैरवी एक बार फिर की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत के सुस्त टीकाकरण कार्यक्रम पर टिप्पणी की है और सरोकार जताया है कि दुनिया के देश इस स्थिति पर चिंतित हैं। बहरहाल हमारे देश में कोरोना टीकाकरण की गति यह है कि 16 जनवरी से 11 मई तक 17 करोड़ से कुछ अधिक खुराकें दी जा सकी हैं। सिर्फ  3.57 करोड़ नागरिकों को ही दोनों खुराकें दी गई हैं। सही मायनों में यही संपूर्ण टीकाकरण है। क्या 139 करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश में इतना टीकाकरण कोई सकारात्मक संकेत देता है? क्या सरकार इन्हीं आंकड़ों से संतुष्ट है? ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, क्योंकि भारत के लगभग आधे जिलों में स्थितियां बेहद बदतर और कुरूप हैं।

 एक विश्लेषात्मक रपट सामने आई है कि 306 जिले ऐसे हैं, जहां कोरोना वायरस की संक्रमण दर 20 फीसदी से ज्यादा है। उनमें से 142 जिलों में टीकाकरण 20 से 50 फीसदी तक घटा है। करीब 62 जिले ऐसे हैं, जहां टीकाकरण 20 फीसदी से भी कम हुआ है। दरअसल ये आंकड़े देश का आम आदमी नहीं जानता और न ही किसी विपक्षी दल ने ऐसा खुलासा किया है। भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में 200 पन्नों से अधिक का जो हलफनामा  दिया है, उसमें टीकाकरण नीति को ‘उचित’ करार दिया है और दावा किया है कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत सभी नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की जा रही है। दरअसल यह दावा भी बुनियादी तौर पर गलत और खोखला है। एक ही वाक्य में कहा जा सकता है कि भारत में नागरिकों को जन-स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं भी हासिल नहीं हैं। कोविड मरीज लावारिसों की तरह मर रहे हैं। अस्पताल संवेदनहीन दुकानें हैं। यदि जन-स्वास्थ्य का अधिकार सुरक्षित होता, तो ऑक्सीजन के अभाव में ही ‘नरसंहार’ सामने न आते। यह शब्द इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने इस्तेमाल किया था, लिहाजा उससे बदतर और बदहाल स्थितियां परिभाषित होती हैं। बेशक कोरोना के खिलाफ हमारा टीकाकरण कार्यक्रम दुनिया में सबसे बड़ा और व्यापक है। तो सरकार को उसकी ठोस नीति तय करनी चाहिए थी। भारत सरकार को एहसास होना चाहिए था कि सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बॉयोटेक दोनों कंपनियां ही भारत में टीकाकरण के लिए पर्याप्त खुराकों का उत्पादन नहीं कर सकतीं। दावे कुछ भी किए जाएं, लेकिन यह शुरू से ही स्पष्ट था कि टीकाकरण अभियान अवरुद्ध हो सकता है। कोरोना की मौजूदा लहर का बहाना भी बनाना छोड़ दें, क्योंकि हर स्थिति में टीकाकरण तो किया ही जाना था।

 ये आकलन भी दिए गए थे कि कमोबेश करीब 90-100 करोड़ आबादी को टीका देना लाजिमी है, ताकि ‘हर्ड इम्युनिटी’ तक पहुंचा जा सके, लेकिन मोदी सरकार और भाजपा के प्रवक्ता सिर्फ  यही गिनवाते रहते हैं कि 18 करोड़ टीके मुफ्त दे चुके हैं। राज्यों के पास 84 लाख टीके जमा हैं और 53 लाख खुराकें तीन दिन में पहुंच जाएंगी। सवाल है कि टीकाकरण अवरुद्ध क्यों है? लंबी-लंबी कतारें टीकाकरण केंद्रों के बाहर क्यों लगी हैं? बूढ़े और जवान नागरिक बिना टीका लगवाए ही लौट क्यों रहे हैं? बेशक यह सियासत भी हो सकती है। सियासत आम आदमी की जिंदगी से भी खेल सकती है, लेकिन डा. फाउची और दुनिया के कई देश भारत के टीकाकरण और कोविड के नए विस्तार से चिंतित क्यों हैं? शायद वे आंक रहे हैं कि कल भारत दुनिया के लिए संक्रमण का नया खतरा पैदा कर सकता है! इससे भी बड़ी चिंता यह है कि कोविड की तीसरी लहर की संभावनाओं के मद्देनजर बच्चों के लिए टीके का परीक्षण तक हमारे देश में शुरू नहीं किया गया है। 6-17 साल के बच्चों की आबादी भी करीब 45 करोड़ है। चूंकि तीसरी लहर को बच्चों के लिए गंभीर खतरा आंका गया है, लिहाजा बच्चों के टीकाकरण का सवाल भी स्वाभाविक है। क्या सरकार विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर विदेशी टीकों को भी भारत में मान्यता देने का काम करेगी?