मौत का पूर्वाग्रही आकलन

By: May 11th, 2021 12:05 am

हम अभी तक ‘द लांसेट’ को प्रख्यात वैज्ञानिक और चिकित्सीय शोध पत्रिका मानते थे। अब भी असंख्य लोगों का अभिमत यही होगा, लेकिन हमारी धारणा एकदम चकनाचूर हुई है। बड़ा विस्फोटक मोहभंग हुआ है। हमें एहसास है कि ‘लांसेट’ के अस्तित्व और स्वीकार्यता पर इसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन मोहभंग छोटे-छोटे कंकर-पत्थर होते हैं, जो एकाएक ‘रामसेतु’ के रूप में अवतरित होते हैं। ‘लांसेट’ अपने अंतरराष्ट्रीय अहंकार में चूर, बेशक, रहकर ऐसे मोहभंगों की परवाह न करे, लेकिन विराट, विविध और व्यापक भारत भी ‘लांसेट’ की संपादकीय टिप्पणी को खारिज करता है। इसका बुनियादी कारण है कि पत्रकारिता इस स्तर पर भी दुराग्रहों से सनी हुई है। भारत का अपना अस्तित्व है, गौरव-सम्मान है, हैसियत है और दुनिया की सहस्त्र भुजाएं सुरक्षा चक्र की तरह उसके चौगिर्द मौजूद हैं। कोरोना वायरस की वैश्विक महामारी के मद्देनजर भारत के अपने यथार्थ हैं। खामियां भी हैं, तो कामयाबियां भी हैं। जिन विदेशी अंचलों ने ‘लांसेट’ की ताजपोशी की है, उनमें से कोई भी देश, भारत के एकमात्र राज्य उप्र से, बड़ा और विविध नहीं है।

 भारत के लोग उस राज्य में भी कोरोना से लड़ रहे हैं,  लथपथ हैं, लेकिन पराजित नहीं हुए हैं। नतीजतन आज उस राज्य में मरीज कम और ठीक होने वालों की संख्या अधिक है। हालांकि हम इसे भी निर्णायक स्थिति नहीं मानते। अभिप्रायः यह है कि ब्रिटेन और यूरोपीय देश, भारत के साथ तुलना, कैसे कर सकते हैं? हाहाकार और लाशों के अंबार तो दुनिया के सबसे ताकतवर और संपन्न देश अमरीका ने भी देखे हैं और चिंताजनक आंकड़ों के सिलसिले अब भी जारी हैं। यूरोपीय देशों में भी अस्पतालों के भीतर की दुर्दशा और अव्यवस्था तथा सड़कों पर मरते लोगों को दुनिया ने देखा है। वे सभी खुद को घोर विकसित देश मानते रहे हैं, लिहाजा ‘लांसेट’ का राजनीतिक विश्लेषण भारत के प्रधानमंत्री मोदी को ही ‘कोरोना का खलनायक’ कैसे करार दे सकता है? ‘लांसेट’ को दुनिया का टीकाबाज तय नहीं किया गया है। तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर पत्रकारिता समीक्षा कर सकती है। यह स्वतंत्रता हमें लोकतंत्र देता है, लेकिन ‘लांसेट’ के संपादकीय में जो आंकड़े दिए गए हैं, भारत उन्हें झेल चुका है और लगातार कई दिनों तक 4 लाख से अधिक संक्रमित मामलों को देख चुका है। ताजातरीन आंकड़े घटकर करीब 3.67 लाख रोजाना पर आ चुके हैं, लेकिन करीब 3.53 लाख ठीक होकर अपने घरों को लौट भी चुके हैं। मौतों की संख्या पूरे कोरोना काल के दौरान अब भी 2.5 लाख से कम हैं और ‘पीक’ के विभिन्न आकलन सामने आ रहे हैं। उनके मद्देनजर भारत में कोविड से मौतों की संख्या 10 लाख तक  पहुंचना ‘लांसेट’ का एक पूर्वाग्रही आकलन है। वह भारत को बीमार और कोरोना के लिहाज से सबसे असुरक्षित और खतरनाक देश चित्रित करना चाहता है। शायद इस विश्लेषण के पीछे भी हमारे ही कुछ राजनीतिक दल होंगे, क्योंकि ‘जयचंद’ की परंपरा आज भी भारत में है।

 भारत में, उसके प्रधानमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और अन्य जिम्मेदार चेहरों को, जवाबदेही के लिए मीडिया ने लगातार कठघरे में खड़ा किया है। यह भारत और उसके नागरिकों का विशेषाधिकार है, लेकिन कोई विदेशी पत्रिका अकेले प्रधानमंत्री पर ही ठीकरा फोड़ने की कोशिश करेगी, तो कमोबेश वह भारत को स्वीकार्य नहीं होगा और भारत उसे खारिज भी करेगा। ‘जयचंद’ अपनी साजिशें जारी रखें। पत्रकारिता की तटस्थता का धर्म यह है कि ‘लांसेट’ अमरीका,  ब्रिटेन, यूरोपीय देशों और चीन के राष्ट्राध्यक्षों (राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री) को भी, कोविड की अनियंत्रित और जानलेवा स्थितियों के लिए, कठघरे में खड़ा करती। पत्रिका में यह जानने की भी कोशिश करनी चाहिए थी कि इन देशों के नेताओं ने भारत की स्थिति पर क्या बयान दिए हैं और कितनी मदद मुहैया करवा रहे हैं, लेकिन कोरोना के सबसे बड़े अपराधी देश, चीन, को ‘लांसेट’ ने लगभग हरी झंडी दिखा दी। यह कैसी पत्रकारिता और कैसा विश्लेषण है। ‘लांसेट’ ने भारत में टीकाकरण अभियान की धीमी गति की बात कही है और सुझाव भी दिया है कि कोरोना के खिलाफ  टीका ही सबसे मजबूत सुरक्षा चक्र है। ऐसे सुझावों का स्वागत है, लेकिन भारत के लोकतंत्र और संविधान में कोई प्रधानमंत्री किसी का भी गला घोंटने की कोशिश नहीं कर सकता। कानून की धाराएं प्रधानमंत्री को भी लपेट सकती हैं। भारत में प्रधानमंत्री को भ्रष्टाचार के एक मामले में ‘अभियुक्त’ तक घोषित कर दिया गया था और अदालती कार्रवाई का भी फैसला ले लिया गया था। बहरहाल ‘लांसेट’ को भारत की गरिमामय परंपराओं की जानकारी कैसे होगी? बेहतर होगा कि पत्रिका विज्ञान और चिकित्सा के डाटा छापने तक ही सीमित रहे।