कविता : दफ्तर की सीढि़यां

By: May 9th, 2021 12:02 am

कभी ऊपर ले जातीं

कभी नीचे धकेल देतीं

घिसे हुए

अरमानों की तरह

हर रोज कदमों की भीड़ में

परिचितों-अपरिचितों की तरह

मुलाकात करती हैं

टूटते या फूटते पैमानों की तरह

कभी-कभी खुरदरी हो जाती हैं

थके हुए पांवों की तरह

कराहती हैं, पुकारती हैं

हथेलियों पर जलते दीप की तरह

हर बार इंतजार में

किसी आते जोश की तरह

आवाज करती हैं चोट की तरह

सारा दफ्तर कदमताल पर है

कांप रही हैं सीढि़यां

कोविड इन पर भी गुजर गया

खबर पहुंची श्मशान की तरह

अब भीड़ नहीं सिसकियां भारी हैं

अंधेरों में रात की तरह

दफ्तर के हालात से

सीढि़यां अकेली होने लगी हैं

अपने वजूद पर घटते रोजगार की तरह

दफ्तर जहां से चढ़ता-उतरता था

उन कदमों के निशान गुम हैं

सीढि़यां सन्नाटे में हैं

कोरोना से डसी किसी लाश की तरह।

-निर्मल असो