टीके पर गुमराह राजनीति

By: May 14th, 2021 12:02 am

मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री अथवा किसी विपक्षी दल का नेता होना और भ्रामक बयानबाजी करना बेहद आसान है, क्योंकि उसमें कोई जिम्मेदारी या जवाबदेही निहित नहीं है। संविधान में भी गलतबयानी के लिए सजा के प्रावधान नगण्य हैं अथवा कम प्रभावी हैं। जनादेश किसी भी वयस्क नागरिक को विधायक चुन सकता है। चूंकि बहुमत को भी सदन में वोट देने के लिए बंधक बनाने के नियम हैं, लिहाजा बहुमत वाली पार्टी का नेता, विधायक दल का नेता भी, चुना जा सकता है। यही हमारा लोकतंत्र है, लिहाजा वह नेता शपथ के बाद मुख्यमंत्री बन जाता है। अधिकतर मामलों में हमने देखा है कि मुख्यमंत्री को सरकारी और अंतरराष्ट्रीय नियमों, संधियों और दायित्वों की जानकारी नहीं होती, नतीजतन वे अनाप-शनाप बयानबाजी करते रहते हैं। यह भी राजनीति के तहत किया जाता रहा है। कोरोना वायरस का टीककरण भी ऐसे ही भ्रामक और सियासी बयानों का शिकार हुआ है। विडंबना यह है कि औसत नागरिक भी जान नहीं पाता कि कौन-सा पक्ष सच बयां कर रहा है और कौन झूठ बोल रहा है! नतीजतन सियासत यूं ही जारी रहती है और आम आदमी को पीडि़त होना पड़ता है।

 बेशक हमारे देश में कोरोना टीकों का संकट है और वह स्वाभाविक भी है, क्योंकि उत्पादन सीमित है। इसके बावजूद हम अंतरराष्ट्रीय दायित्वों से मुंह नहीं मोड़ सकते। सबसे पहले कांग्रेस ने यह सवाल करना शुरू किया कि 6.5 करोड़ के करीब खुराकों का निर्यात क्यों किया गया? उसके बाद नए परिदृश्य में दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने अपने उप मनीष सिसोदिया और आम आदमी पार्टी के कुछ छुटभैया नेताओं को अग्रिम मोर्चे पर तैनात कर दिया। वे भी लगातार सवाल पूछने लगे कि इतने टीकों का निर्यात क्यों किया गया? पाकिस्तान तक को टीका दिया गया, जबकि केंद्र सरकार को पता था कि एक बड़ी आबादी का टीकाकरण किया जा सकता था। देश को गुमराह करने की राजनीति का सिलसिला तब भंग हुआ, जब भाजपा प्रवक्ता डा. संबित पात्रा ने तथ्यों का स्पष्टीकरण दिया और सच सामने आया कि सिर्फ  78.5 लाख खुराकें पड़ोस के सात देशों को भेजी गईं, ताकि उन सरहदों से संक्रमण हमारे देश के भीतर न आ सके। सिर्फ 2 लाख खुराकें संयुक्त राष्ट्र की ‘शांति सेना’ को भेजी गईं, जिस सेना में भारत के भी करीब 6600 सैनिक हैं। इसके अलावा, 5.5 करोड़ खुराकें अंतरराष्ट्रीय और व्यापारिक जिम्मेदारियों और करार के तहत, टीका कंपनियों को ही, विदेश भेजनी पड़ीं। मसलन-सीरम कोवीशील्ड टीके का उत्पादन कर रहा है, जिसकी मूल लाइसेंसधारी कंपनी एस्ट्राज़ेनेका है। उसे ब्रिटिश सरकार ने लाइसेंस दिया है। उस कंपनी ने उत्पादन के लिए सीरम के साथ समझौता किया है। क्या सीरम को करार के मुताबिक टीके एस्ट्राज़ेनेका को भेजने होंगे या नहीं? इसी तरह कच्चे माल और अन्य सेवाओं के लिए दूसरे देशों के साथ भी करार किए गए होंगे! यह टीकाकरण शुरू होने से पहले की स्थितियां हैं। हमें सिसोदिया और ‘आप’ के छुटभैयों के व्यावहारिक ज्ञान पर तरस आता है अथवा वे जानबूझ कर राजनीति खेल रहे हैं और मासूम, असहाय दिखना चाहते हैं?

केजरीवाल समेत जिन विपक्षी नेताओं ने कोरोना टीके का फॉर्मूला सार्वजनिक करने और दूसरी कंपनियों द्वारा भी उत्पादन के रास्ते खोलने की मांग प्रधानमंत्री मोदी से की है, कमोबेश उन्हें यह जानकारी जरूर होगी कि संयुक्त राष्ट्र के कानून और बौद्धिक संपदा अधिकारों के मद्देनजर कोवीशील्ड का फॉर्मूला सार्वजनिक साझा नहीं किया जा सकता। भारत बॉयोटैक कंपनी का टीका कोवैक्सीन, बेशक, पूर्णतः भारतीय है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के जरिए केंद्र सरकार ने कई कंपनियों से बातचीत भी की है। यह कोविड टीका निर्माण का सवाल है, न कि किसी गोली-बिस्कुट या पेरासिटामोल जैसी दवा बनाने का मामला है। औसत फार्मा कंपनियां भी ऐसा टीका बनाने में अक्षम हैं, क्योंकि उनके पास अपेक्षित बायो सेफ्टी का उच्चस्तरीय ढांचा और संसाधन नहीं हैं। फिर यह सवाल केजरीवाल और विपक्ष बार-बार क्यों उठा रहा है? कमोबेश यही राजनीति है। विपक्ष टीकाकरण को नाकाम कर साबित करने पर तुला है कि मोदी सरकार ही ‘खलनायक’ है। उन विपक्षियों से पूछा जाए कि अभी तक उनकी राज्य सरकारों ने जितना टीकाकरण किया है और कर रही हैं, वे खुराकें किसने मुहैया कराई थीं? यदि टीकाकरण केंद्र बंद करने की ‘पीडि़त’ सियासत की जाती रहेगी, तो अंततः कष्ट किसे होगा और कोविड का शिकार किसे बनना पड़ेगा? लिहाजा टीकों पर आंकड़ेबाजी बंद की जाए और देश के सामने सही चित्र पेश किया जाए कि यह समस्या जल्द ही खत्म होने वाली है।