माले मुफ्त, दिले बेरहम

By: May 6th, 2021 12:05 am

‘क्या तुमने ढपोर शंख की कहानी सुनी है?’ छप्पर वाले बाबा ने हमें बुला कर पूछा। ‘जनाब, यहां कहानियां सुनने की फुर्सत किसके पास है? यहां तो रोज़ी-रोटी प्राप्त करने के नाकाम सपने देखते-देखते ही दिन पर दिन, बरस पर बरस कट गए। अब लीजिए नए सपनों की बारात सजा कर चंद दूल्हे हमारी नगरी में आए हैं।’ बाबा ने हमदर्दी नहीं हिकारत से हमारी ओर देखा। बोले, कैसे उजबक हो तुम चपश्कनाती के नाती?’ हम क्या जवाब देते? केवल उस बिगड़े हुए बायस्कोप की ओर देखते रहे, जो पांच वर्ष पहले बाबा ने हमें मित्र बनाकर दिया था। तब आनुवांशिक स्वर में गूंजता हुआ मित्रों ‘स्वर, कितना अच्छा लगता था। हमारे अंदर तक उत्तर गया था। तब हम कभी उस बायस्कोप से पूछते, रोज़गार दोगे? ‘एक क्यों दो करोड़ देंगे।’ जवाब मिलता। हम अपना पल्लू टटोलते। पल्ले नहीं दाने, अन्ना चली भुनाने। हम कहते, जेब में एक छदाम नहीं। बाबा, जि़ंदगी कोई चार्ली चैप्लिन की फिल्म नहीं कि अपने जूते को ही बर्गर बना खाने का सपना देख लें।

बाबा का बायस्कोप बोलता, क्यों नाके पर खुल गई है न नई साझी रसोई। दस रुपए में भरपेट भोजन मिलता है। कतार लगा, रोटी खा। लेकिन जेब में पैसे कहां थे? सस्ती रसोई के बाहर सुरसा की आंत सी लंबी कतार लगती है। रसोई खुल गई तो गनीमत। लंगर मस्ताना होने से पहले बारी आ जाए तो भी गनीमत। लेकिन बंधु, फटी जेब वालों को तो यहां भी खड़ा नहीं होने देते। लोगों में धर्म-कर्म की भावना का हृस हो गया। अब तो पवित्र संगरांद को भी लंगर नहीं लगते। भगवान की शोभा-यात्रओं से लेकर नेताओं की विजय यात्राओं का भरोसा कभी था। लेकिन वहां भी अब लंगर नहीं लगते, केवल लड्डू बंटते हैं। अब भला बताओ दो लड्डुओं से किसी का पेट भरता है। खुद खाएं कि बच्चों को खिलाएं? बाबा का बायस्कोप बोला और अब तो बैंक खाते वाले हो। इसी की ज़मानत पर उधार ले लो।’ हमें यह बायस्कोप किसी ढपोर शंख का भाई बंद लगा। जहां से  मांगों तो चार देने का वायदा मिलता है। हमारा तो हौसला मांगने का नहीं था। वे घर आकर जन धन खाते खोल गए। खाते इतने दिन से खाली पड़े हैं कि अब तो उन्हें ‘जन जन’ खाते कह देना चाहिए। सुना था नोटबंदी हो गई। हर खाते में पंद्रह-पंद्रह लाख रुपए आ जाएंगे।

 आए साहिब, जैसे देसी गाना गुनगुना रहे हो, झलक दिखला जा, एक बार आ जा आ जा, आ जा।’ हां, गरीब गुरबा की सुनी गई, हुजूर पैसों ने खातों में एक बार झलक दिखाई, फिर काला लबादा उतार, सफेद पोश हो पलक झपकते ही ओझल। पंद्रह लाख आने का ढपोरशंखी इंतज़ार लंबा हो गया। कोरे खातों के पन्नों को अब दीमक सहला रहे हैं। खाता खुलने पर जीवन बीमा का वायदा मिला था। पैसे डालते तो बीमा मिलता? हमें खाली खातों पर बीमें की खैरात कौन देता? बीमा कम्पनियां फेल कराओगे क्या? उधर बैंक वाले चिल्लाते हैं। ‘बाज आए, ऐसी मोहब्बत से उठा लो पानदान अपना।’ कब तक खाली खाते खोल कर गिन्नीज बुक ऑफ  रिकार्ड में शामिल होते रहें। ऐसा पदक लेकर क्या करेंगे, अगर इन खातों के बोझ तले बैंक व्यवस्था चरमरा जाए। पहले मरे हुए खातों की देह का बोझ ही नहीं उठ रहा था, अब यह खाली खातों का रिकार्ड बनाने का रण समर। जिस तेज़ी से खोले थे, उसी तेज़ी से बंद करने की इजाज़त दो, जहांपनाह। ‘नहीं, नहीं, नहीं, हम जहांपनाह लोगों के हृदय सम्राट हैं। हम अपने वायदों से पीछे नहीं हटेंगे।’ अभी फिलहाल यह पंद्रह-पंद्रह लाख रुपया नहीं, यह पांच-पांच सौ रुपया जारी करके इन खातों का मुंह पोंछ दिया।

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सुरेश सेठ

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