साहित्य विचार नहीं, मनोरंजन बना

By: May 2nd, 2021 12:04 am

साहित्य की निगाह में आजादी के सरोकार

साहित्य की निगाह उसके रचयिता के कैमरे के पिक्सलों के अनुसार होती है। आजादी ने समाज को खुली हवा में विचरण और संविधान ने उसे एक बड़ा वितान दिया। समाज ने उसे आत्मसात किया और विभिन्न विकास योजनाओं का क्रियान्वयन आरंभ। समाज को उसकी अपेक्षा से कितना मिल पाया, यह वह ठीक तरह से नहीं जानता। वह अपनी ग्रोथ के साथ वैचारिक प्रतिबद्धताओं में बंधता गया। कुछ विचारधाराएं आजादी के साथ आई और परवान चढ़ी। कुछ खरामा-खरामा आक्टोपस की तरह चलीं और जलकुंभी की तरह फैल गईं। कौन कितना लपेटे में आया, यह कोई नहीं जानता। विकास ने संपूर्ण विश्व को एक गांव सा बन दिया है। अब गणेश के दूध पीने का संदेश क्षणांश में विश्वव्यापी हो जाता हैं। आजादी के सरोकार कुछ ये ही तो हैं। नहीं, इसके अलावा कुछ प्रतिकूल भी हुआ है। छोटी-छोटी बच्चियों से बलात्कार और प्रभावी दबाव। कोई सुनने वाला ही नहीं। सूखा और विभिन्न कारणों से किसानों की आत्महत्याएं ही नहीं बल्कि किसी मजलूम वर्ग के बारे में बोलना, लिखना अपराध भी।

असंतुष्टता की पराकाष्ठा में कुछ अव्यक्त सा अंतःसुख के चाह की सजा। समाज एक अलग राह पकड़ उसे संभाल ही नहीं पा रहा। साहित्य के मन की निगाहें हमारे हाथ और कमरे में रखे मूर्ख बनाने के यंत्रों के वशीभूत उस सबको देखने, सुनने नहीं देते जो चल रहा है। विचारों पर एक प्रकार का पहरा सा है। एक निश्चित प्रोपेगंडा के तहत समाज का दिमाग कंडीशंड हो गया है। इतना कुछ परोसा जा रहा है कि साहित्य के साथ समाज भी बाजार हो गया है। ऐसे में समाज किसी उत्प्रेरणा की उपज वांछनाओं का शिकार असंतुष्ट से दाम्पत्य, आत्मीय संबंधों से दूर एषणाओं का शिकार हो अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहा है।

वैचारिकता के धरातल पर साहित्य बिखर गया है। कहीं वह मात्र बिगुल बजाता ही रह गया है और कहीं बड़बोला हो गया है तो कहीं इतना एकांगी हो गया है कि वह खराब कैमरे की तरह सामाजिक मूल्यों के परिवर्तन और अपेक्षाओं को पूरी तरह नहीं देख पाता। कितने साहित्य के संवाहक तटस्थ धृतराष्ट्र बने खड़े हैं। कोई साहित्य ऐसा नहीं मिलता जिसे फेसबुक, ट्वीटर अथवा व्हाट्सऐप पर साझा किया जा सके। किसी बैठक में सुनाया जा सके। साहित्य विचार नहीं, मनोरंजन बना हुआ है। ऐसा साहित्य क्या उत्प्रेरणा देगा? साहित्य कमजोर हो नेतृत्व न कर पाने की अवस्था में है। एक डर का सा माहौल भी है जिससे समाज निष्क्रियता और निष्कर्म की ओर भी अग्रसर है। विकृत हो रही सामाजिक दशा को कैसे दुरुस्त किया जाए, यह काम साहित्य का तो है परंतु कोई ध्वजवाहक नहीं है। समाज भी एकसा नहीं है। विभिन्न रंगों और लक्ष्यों की साधना में विचरण कर रहा है। अधिकांश समाज शब्द से भी लगाव नहीं रखता।