भक्ति कुदरत की तरह

By: May 8th, 2021 12:20 am

सद्गुरु  जग्गी वासुदेव

अपने यहां एक महिला संत हुई हैं। क्योंकि वह बोलती नहीं थी, अतः कोई नहीं जानता था कि वह कहां से आई थी। लेकिन उनके चेहरे को देखकर लगता था कि वह नेपाल से आई थी। वह दक्षिणी भारत के छोर पर बसे शहर कन्याकुमारी में रहती थी। वह अकसर सड़कों पर घूमती रहतीं और कुत्तों को खाना खिलाती…

भक्ति कुदरत की तरह है। कुदरत देने में कंजूसी नहीं करती, वह हर चीज में अपने आपको पूरी तरह से समर्पित कर देती है, कुदरत की हर चीज अपनी पूरी क्षमता से देना जानती है। जबकि मनुष्य बचत करने का प्रयास करता है। क्योंकि इनसान खुशी, अपना प्यार और वह सारी बातें, जो उसके लिए बेहद प्रिय व मायने रखती हैं, उन्हें बचाने की कोशिश करता है, इसलिए उसे कई तरह का आडंबर करना पड़ता है। अगर मनुष्य सिर्फ  चुपचाप बैठकर पूर्ण आनंद में जा सके, तो फिर उसे अपना सारा ध्यान रात के खाने और पीने के इंतजार में नहीं लगाना पड़े।

लेकिन मनुष्य ने जीवन के प्रति अपना स्वभाव ही ऐसा बना लिया है कि वह हर वक्त अपने को बचाने की कोशिश करता है। हर वक्त इंतजार करते रहता है। कब रात होगी और कब खाना मिलेगा? अगर मनुष्य हर पल अपने आपको आनंद में सरोबार पाता, प्यार में डूबा पाता, भावातिरेक में खो गया होता, तो उसका मन रात के खाने या किसी अन्य भौतिक सुख के इंतजार में व्यर्थ चिंतन करते हुए व्यतीत नहीं होता। इन भौतिक सुखों की सोच में मनुष्य अपने जीवन का ज्यादातर समय बर्बाद नहीं करता।

भक्ति होती ही ऐसी है, जिसमें आपको आत्मसंचयन यानी खुद को बचाने की अपनी हर हद और चारदीवारी गिरा देनी होती है और अपने आपको अपनी सर्वाधिक सीमा तक बहने देना होता है। अगर आप किसीके भी प्रति समर्पित होकर एक बार अपने अस्तित्व के ठोस ढांचे को गिरा देते हैं, तो सहसा आप पाएंगे कि जिसके प्रति भी आप समर्पित हैं, उसकी खूबियां आपके भीतर प्रतिबिंबित हो उठेंगी और वही खूबियां आप में तब्दील हो जाएंगी।

 मैंने इसे अपने जीवन में कई रूपों में बेहद नाटकीय ढंग से घटते देखा है। चाहे वह लेखक हों, वैज्ञानिक, खिलाड़ी, घरेलू महिला या कोई अन्य व्यक्ति क्यों न हो, अगर वह अपने काम को पूरे समर्पण के साथ करता है, तो उसमें अलग तरह की खूबियां नजर आने लगती हैं। मैंने इसका एक बेहतरीन उदाहरण देखा है। अपने यहां एक महिला संत हुई हैं। क्योंकि वह बोलती नहीं थीं, अतः कोई नहीं जानता था कि वह कहां से आई थी। लेकिन उसके चेहरे को देखकर लगता था कि वह नेपाल से आई थी। वह दक्षिणी भारत के छोर पर बसे शहर कन्याकुमारी में रहती थी। वह अकसर सड़कों पर घूमती रहती और कुत्तों को खाना खिलाती। इस तरह से उसके आसपास कुत्तों का एक पूरा परिवार खड़ा हो गया। यहां तक कि जब वह वह खुद खाना नहीं खाती, तब भी कुत्तों को खाना खिलाती थी। दरअसल वह कुत्तों से बेहद प्रेम करती थीं। उसे कई बार काफी अशोभनीय और नागवार सामाजिक हालातों का सामना करना पड़ा। लेकिन तभी लोगों ने उन्हें कभी-कभी महासागर की लहरों पर तरते या बहते पाया। लोगों ने जब यह सब देखा, तो उन्होंने उनकी पूजा करनी शुरू कर दी।