दोस्ती जिंदगी से…

By: May 13th, 2021 12:08 am

जीवन में हम अक्सर देखते हैं कि हमारे ज्यादातर रिश्तों में मिठास नहीं रही, गर्मी नहीं रही और वो धीरे-धीरे सूखते जा रहे हैं। रिश्ते तो ऐसे होने चाहिएं जो सार्थक हों, जिनमें खुशी मिले और परिपूर्णता महसूस हो। सभी तरह की खोजों का नतीजा यह है कि जिन रिश्तों में बातचीत चलती रहती है, मतभेद के बारे में गुस्सा होने के बजाय बात की जाती है वो रिश्ते टिकते हैं, चाहे वो परिवार हों, सहकर्मी हों, समाज हों या राष्ट्र ही क्यों न हों। जहां बातचीत चलती रहती है, वहां हल निकलने की गुंजाइश बनी रहती है, बातचीत बंद हो जाए तो हल की गुंजाइश भी खत्म हो जाती है…

समय के साथ-साथ देश बदल गया है, लोगों की सोच बदल गई है, व्यवसाय का तरीका बदल गया है और मीडिया भी बदल गया है। बदलाव जो आए, समय के साथ-साथ आए, धीरे-धीरे आए। कभी वो चुभे भी, फिर भी जीवन में रम गए, लेकिन कोरोना ने तो सब कुछ उलट-पुलट कर डाला है। जीवन पूरी तरह से बदल गया है। जीवन बदला ही नहीं, कष्टपूर्ण भी हो गया है। बहुत से परिवारों ने प्रियजन खोए हैं या उनके प्रियजन जीवित रह पाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। माहौल में ठहराव है, डर है, निराशा है और भ्रम की स्थिति है। सोशल मीडिया ने जहां संबल दिया है, वहीं तरह-तरह की अफवाहों के साथ या विरोधाभासी सूचनाओं के साथ डराया भी है। इस बीच मेरे बहुत से मित्रों ने मुझसे पूछा कि ऐसे निराशाजनक माहौल में भी आप खुश कैसे रह लेते हैं और दूसरों को खुश बने रहने की सलाह किस आधार पर देते हैं। मीडिया और जनसंपर्क क्षेत्र में चार दशक तक रहने के बावजूद आज लोग मुझे हैपीनेस गुरू के नाम से ज्यादा जानते हैं।

महिलाओं की प्रसिद्ध पत्रिका गृहलक्ष्मी के फेसबुक पेज पर हर रविवार को मेरा लाइव सैशन होता है जहां मैं रिश्तों की बात करता हूं, परिवार की बात करता हूं और खुश रहने के टिप्स देता हूं। इस लाइव सैशन का जि़क्र इसलिए क्योंकि जब कोरोना का कहर शुरू हुआ तो मैंने ये सैशन शुरू ही इसलिए किए ताकि मैं कुछ लोगों में आशा का दीप जला सकूं। मेरे एक मित्र हैं जिन्होंने खानाबदोशों की जि़ंदगी को बड़ी बारीकी से देखा है और वे सभ्य समाज को उनकी प्रथाओं से सीख लेने की सीख देते हैं। एक बार उन्होंने मुझे बताया कि खानाबदोश लोग ज्यादा खुश रहते हैं क्योंकि उनके जीवन में स्थायित्व नहीं है। हर रोज़ नई जगह, नया वातावरण, नया संघर्ष उन्हें जीवंत बनाए रखता है। हम लोग जो सभ्य हो गए, एक ही जगह बस गए, कहीं न कहीं कुछ खास आदतों और सुविधाओं के आदी हो गए, इसलिए जब कभी उन आदतों या सुविधाओं में व्यवधान आए तो हमें बेआरामी महसूस होती है। खानाबदोशों के जीवन में सुविधा है ही नहीं, इसलिए न उन्हें कुछ छिन जाने का डर होता है, न उन्हें बेआरामी महसूस होती है। वे हर हाल में अगले पल के बारे में सोचते हैं और सामने नज़र आ रही चुनौतियों को हल करने की फिराक में रहते हैं। चुनौतियां उन्हें निराश नहीं करतीं क्योंकि जीवन ही उनके लिए चुनौती है। वे उम्मीद करते हैं कि जीवन उनके लिए सुखद तो नहीं ही होगा, जीवन में अचानक उतार-चढ़ाव आएंगे और किसी भी तरह के बदलाव संभव हैं, सो वे हर स्थिति के लिए हमेशा तैयार भी रहते थे। उनके नज़रिए में एक खास गुण यह होता है कि वे सोचते हैं कि जो होना था हो गया, अब आगे की सोचो। जीवन में मृत्यु में, सुख में, दुख में, सुविधा में, कठिनाई में अगर हम इस छोटे से पाठ को सीख लें कि ‘जो होना था हो गया, अब आगे की सोचो’ तो जीवन के सारे दुख खुद-ब-खुद दूर हो जाएंगे। यह वो नज़रिया है जिसमें सोच यह है कि जो हम कर सकते हैं, वो करें और जो हमारे पास बच गया है, उसका आनंद लें। हम घटनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते, जो घटना घटेगी, वह घट ही जाएगी, हम सिर्फ उस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित कर सकते हैं। इसी में जीवन का सार छिपा है। जि़ंदगी से दोस्ती का यह सबसे बढि़या जुगाड़ है।

 खानाबदोश लोग जि़ंदगी से दोस्ती निभाते हैं, जिंदगी की ओर पूरी तवज्जो देते हैं और मानो जि़ंदगी की खातिरदारी करते प्रतीत होते हैं। नुकसान हो जाए, अपमान हो जाए, घमासान हो जाए, बस सोच यही होती है कि जो होना था हो गया, अब आगे की सोचो। ये खानाबदोश मानते हैं कि जि़ंदगी के बहुत से तोहफे हैं, उम्मीद, हौसला और चलते रहना सब जि़ंदगी के भरोसे है। कोरोना के कारण कोई जिंदगी खत्म हो जाए, यह तो कुदरत के हाथ में है, पर कोई बड़ा आदमी या कोई फिल्म स्टार खुदकुशी कर ले तो वह सारे समाज के सामने गलत उदाहरण छोड़ जाता है। समस्याएं तो आएंगी ही, बदलाव भी होंगे, ताश के खेल में पत्ते कैसे आए इसका महत्त्व उतना नहीं होता, जितना महत्त्व इस बात का होता है कि हमने उन्हें खेला कैसे। पत्ते कैसे आए, इस पर ध्यान देने के बजाय अगर हमारा ध्यान इस बात पर हो कि अब उन्हें खेलें कैसे, तो भी कई समस्याएं आधी हो जाती हैं, क्योंकि फिर हम यह सोचना शुरू कर देते हैं कि जो कुछ हमारे पास है, उसका बेहतरीन उपयोग करके आगे कैसे बढ़ सकते हैं। मान लीजिए हमारा कोई परिचित कोरोना पॉजि़टिव हो जाए तो यह पूछने के बजाय कि ये कैसे हो गया, हमें पूछना चाहिए कि अब आप कैसे हैं? और उन्हें अपनी ओर से कोई दवाई सुझाने के बजाय ये कहें कि शांत-चित्त से अपने डॉक्टर की सलाह के हिसाब से समय पर दवाइयां लेते रहें और अपना ध्यान रखें, यह कहने के बजाय कि अस्पतालों का हाल बहुत बुरा है, हम यह कहें कि ज्यादातर लोग तो घर में ही ठीक हो रहे हैं, हालात बहुत बुरे हैं कहने के बजाय हम यह कहें कि हालात जल्दी ही सुधर जाएंगे, और यह कहने के बजाय कि हमें आपकी चिंता है, हम यह कहें कि हम आपके साथ हैं, जो भी ज़रूरत हो बताइएगा, तो पत्ते जैसे भी हैं पर हम उन्हें खेल ठीक से रहे हैं। ऐसा करेंगे तो हम आशा बांटेंगे और जीवन को जीवंत बनाएंगे।

जीवन में हम अक्सर देखते हैं कि हमारे ज्यादातर रिश्तों में मिठास नहीं रही, गर्मी नहीं रही और वो धीरे-धीरे सूखते जा रहे हैं। रिश्ते तो ऐसे होने चाहिएं जो सार्थक हों, जिनमें खुशी मिले और परिपूर्णता महसूस हो। सभी तरह की खोजों का नतीजा यह है कि जिन रिश्तों में बातचीत चलती रहती है, मतभेद के बारे में गुस्सा होने के बजाय बात की जाती है वो रिश्ते टिकते हैं, चाहे वो परिवार हों, सहकर्मी हों, समाज हों या राष्ट्र ही क्यों न हों। जहां बातचीत चलती रहती है, वहां हल निकलने की गुंजाइश बनी रहती है, बातचीत बंद हो जाए तो हल की गुंजाइश भी खत्म हो जाती है। बातचीत सार्थक हो, इसकी पहली जरूरत यह है कि हम खुद को पढ़ें, खुद को समझें, हम अपने जीवन से चाहते क्या हैं, उसे सही-सही परिभाषित करें। हमें यह तो पता है कि जिसके साथ हम रह रहे हैं वह व्यक्ति ठीक नहीं है, उससे हमारी जम नहीं रही, लेकिन किस तरह के आदमी से जमेगी, इसका हमें ठीक-ठीक पता नहीं है। खुद को समझें, अपनी जरूरतों को समझें और वो जरूरतें बिना किसी लाग-लपेट के सामने वाले को समझा दें तो हर रिश्ता खूबसूरत हो जाएगा, जि़ंदगी कुछ ज्यादा खूबसूरत हो जाएगी और जि़ंदगी से हमारी दोस्ती भी पक्की हो जाएगी।

संपर्क :

पी. के. खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

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