संस्कृत का ज्ञान

By: May 8th, 2021 12:20 am

स्वामी विवेकानंद

गतांक से आगे…

अब केवल यूरोप ही नहीं वरन समस्त भारतवर्ष इस कील विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक पाल डायसन को जानता है। मैंने अमरीका और यूरोप में संस्कृत के कई प्राध्यापकों को देखा है। उनमें से अनेक वेदांत की ओर आकृष्ट हैं। मैं उनके पांडित्य एवं निःस्वार्थ कार्य में जीवनोत्सर्ग को देखकर मुग्ध हो गया हूं। परंतु पॉल डायसन और वृद्ध मैक्समूलर को मैं भारत तथा भारतीय विचार धारा का सर्वापेक्षा आंतरिक तथा यथार्थ मित्र समझता हूं। कील शहर के इस उत्साही वेदांती, उनके भारत भ्रमण की संगिनी उनकी मधुर प्रकृति वाली सहधर्मिणी तथा उनकी प्रिय छोटी कन्या से मेरी प्रथम भेंट जर्मनी तथा हालैंड होकर एक साथ लंदन की यात्रा तथा लंदन एवं उसके आसपास के स्थानों में हम लोगों के आनंददायक सम्मिलन…ये सब घटनाएं मेरे जीवन की अन्य मधुर स्मृतियों के साथ चिरकाल तक बनी रहेंगी। यूरोप के सर्वप्रथम संस्कृतज्ञों की संस्कृत चर्चा में समलोचना शक्ति की अपेक्षा कल्पना शक्ति अधिक थी। उनका ज्ञान तो अल्प था, किंतु उस अल्प ज्ञान से वे आशा बहुत करते थे और बहुधा वे जो कुछ थोड़ा बहुत जानते थे, उससे कहीं अधिक डींग मारा करते थे।

और फिर उस समय कालिदास विरचित शकुंतला को ही भारतीय दर्शनशास्त्र की पराकाष्ठा सोचने का पागलपन भी उनमें समाया हुआ था। अतः स्वाभाविकता ही प्रथम दल की प्रतिक्रिया के रूप में एक ऐसे स्थूलदर्शी समालोचक संप्रदाय का अभ्युदय हुआ जिसे न तो संस्कृत का ज्ञान ही था और न ही संस्कृत के अध्ययन से जिसे कुछ लाभ की आशा दिख पड़ती थी। यह संप्रदाय ऐसा था, जो प्राच्दशाय सभा वस्तुओं का उपहास किया करता था। यद्यपि इस संप्रदाय के लोग प्रथम दल की कल्पना पूर्ण दृष्टि की, जिसके समक्ष भारतीय साहित्य की प्रत्येक वस्तु नंदन कानन की भांति प्रतीत होती है, तीव्र आलोचना करते थे, परंतु इनके स्वयं के सिद्धांत प्रथम दल वालों के सिद्धांतों की तरह ही समान रूप से परम दोषयुक्त एवं अत्यंत दुःसाहसपूर्ण थे और इन लोगों के इस विषय में दुःसाहस के बढ़ जाने का नितांत स्वाभाविक कारण यह था कि भारतीय विचारधारा की ओर सहानुभूति रहित और बिना समझ-बूझे हठात् सिद्धांत बना डालने वाले ये पंडित और समालोचकगण इसकी चर्चा ऐसे श्रोताओं के समाने करते थे, जिनकी इस विषय में किसी प्रकार की राय प्रकट करने की यदि कोई योग्यता थी, तो वह भी उनकी संस्कृत भाषा के संबंध में पूर्ण अनभिज्ञता। इस प्रकार के समालोचक पंडितों के मस्तिष्क से यदि अनेक प्रकार के विरुद्ध सिद्धांत निकले, तो इसमें आश्चर्य ही क्या है? सहसा बेचारे हिंदू ने एक दिन सुबह जागकर देखा,उसका जो कुछ भी अपना था, वह आज नहीं है।