फ्रंट लाइन वैक्सीनेशन

By: May 14th, 2021 12:02 am

कोरोना के खिलाफ मानसिक उथल-पुथल और कर्फ्यू बंदिशों के परिदृश्य में हालात का मुआयना गिड़गिड़ाने लगा है। समझ से परे हालात पर हाथ बांधे खड़ा नहीं हुआ जा सकता है, लिहाजा नई चिंताओं के साथ सूबेदारी, पहरेदारी तथा कारगुजारी बदल रही है। इसी जवाबदेही से निकला डिमांड चार्टर कल तक जिसे महसूस नहीं कर पाया, अब नई जरूरतों में एक समाधान की तरह दर्ज होना चाहता है। हिमाचल में फ्रंट लाइन वर्कर या कोरोना योद्धा बनने की प्रासंगिकता अब एक अधिकार की तरह सामने आ रही है। विद्युत कर्मियों के बाद शिक्षकों को कोरोना योद्धा मानने की गुजारिश के अपने तर्क और परामर्श हैं। जाहिर है विद्युत कर्मियों के अलावा जलशक्ति विभाग के फील्ड वर्कर वास्तव में फ्रंट लाइन वर्कर हैं और जिन्हें न पहले लॉकडाउन की कठोर शर्तें हरा पाईं और न ही आज के कर्फ्यू के बीच ये थके हैं। कर्फ्यू के सन्नाटों के भीतर जिंदगी के दो बड़े पैगाम बिजली और जलापूर्ति से मिल रहे हैं, तो जाहिर तौर पर इस बड़े वर्ग को इतना सम्मान तो मिले कि उनका दायित्व फ्रंट लाइन वर्कर की हैसियत में देखा जाए।

दूसरी ओर शिक्षकों ने लॉकडाउन में भी न केवल शिक्षा के मनोबल को ऊंचा रखा, बल्कि अभिभावकों और बच्चों को इस दौरान निहारते रहे। हम कई तरह से इस वर्ग की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन यह नहीं कह सकते कि कोशिश ही नहीं हुई। एक साल से भी  अधिक समय से कोरोना काल बनाम शिक्षा के मध्य हर अनिश्चितता की ढाल बने शिक्षक ने पाठ्यक्रम को जिंदा रखा, बल्कि घर में कैद बच्चों को छात्र बनाए रखा। इस योगदान को कमतर इसलिए भी नहीं आंक सकते, क्योंकि उसने नए माध्यम यानी ऑनलाइन शिक्षा के अर्थ को शक्ति, संपर्क और साधना का प्रारूप दिया और साथ ही साथ छोटे बच्चों और उनकी माताओं के तकनीकी ज्ञान में इजाफा भी किया। ऐसे में उच्च शिक्षा निदेशक डा. अमरजीत कुमार शर्मा द्वारा उठाई गई यह मांग वाजिब है कि शिक्षकों को भी फ्रंट लाइन वर्कर की अहमियत के तहत तुरंत वैक्सीन लगाई जाए। न जाने कब शिक्षकों की उपलब्धता में कोरोना काल के कितने दायित्व इस वर्ग से जुड़ सकते हैं, इसलिए इन्हें समाज और शासन की अनेक भूमिकाओं का मुख्य किरदार मानना ही होगा। वैसे भी अध्यापक से किसी भी राष्ट्रीय अभियान का श्रीगणेश करने का तात्पर्य इसकी स्वीकार्यता में गांव-देहात से अभिभावकों के समर्थन तक निरूपित होता है। इसी बीच पंचायती राज संस्थाओं के प्रतिनिधियों से मुख्यमंत्री जयराम का वर्चुअल संवाद हिमाचल के उस हिस्से का संबोधन है, जहां प्रदेश की 92 फीसदी आबादी बसी है।

गांव की ओर बढ़ते कोरोना के दंश पहले से कहीं अधिक घातक हैं, इसीलिए कुछ प्रधानों का सुझाव है कि बाजार ख्ुलने की सीमा एक घंटा और घटा दी जाए। ऐसे में पंचायती राज की नई भूमिका में कोरोना से निपटने का संकल्प फ्रंट लाइन वर्कर की एक नई श्रृंखला खड़ी कर रहा है और यही मांग अब आनी शुरू हो गई है। आशंकाएं गांव के डिपो धारक की भी इसलिए हैं क्योंकि वह मुफ्त व सस्ते राशन आबंटन की प्रमुख कड़ी है। बायोमीट्रिक मशीनों के जरिए राशन वितरण की औपचारिकताएं अपने आप में चुनौतीपूर्ण हैं, इसलिए तर्क की गुंजाइश में वे भी खुद को फ्रंट लाइन मान रहे हैं। यह सूची बढ़ती जाएगी और जब तक हर पात्र व्यक्ति को वैक्सीन नहीं लगती, सरकार से प्राथमिकता के आधार पर कोई न कोई गुजारिश करता रहेगा, लेकिन जिनके सहारे सभी बाहर आएंगे उनका चयन होना चाहिए। राष्ट्रीय सूचनाओं के आधार पर यह माना जा रहा है कि कोरोना के दुष्परिणामों का सबसे बड़ा चक्र गांव की ओर मुड़ रहा है, अतः पंचायत प्रतिनिधियों को जमीन पर उतारने के साथ-साथ वैक्सीनेशन पर भी जोर दिया जाए। इस बार अधिकतर प्रधान युवा हैं और उनका आयु वर्ग 18 से 44 वर्ष की प्रतीक्षा सूची में वैक्सीनेशन का ख्वाब पाल रहा है। हिमाचल करीब बीस लाख वैक्सीन डोज लगा चुका है जबकि अपने प्रयासों से 18 से 44 आयु वर्ग के लिए पहली खेप आने के बाद युवाओं को भी प्रतीक्षा सूची से मुक्ति मिलनी शुरू हो जाएगी। किसी भी प्रदेश के लिए वैक्सीनेशन के ये आंकड़े उत्साहजनक हो सकते हैं, लिहाजा अगले दौर के फ्रंट लाइन वर्कर में हर डोज का न्यायोचित आधार व दायरा बढ़ जाएगा।