लोक गायन परंपरा में ही संरक्षित है लोकसाहित्य

By: May 9th, 2021 12:04 am

डा. मनोरमा शर्मा,  मो.-9816534512

मानव को आपस में एक-दूसरे से संपर्क करने तथा अपने मनोभावों की अभिव्यक्ति के लिए सबसे प्रथम संभवतः भाव-भंगिमाओं अथवा संकेतों का प्रयोग शुरू हुआ होगा। बहुत बाद में  लिपि का आविष्कार हुआ होगा। भारतीय संस्कृति से जुड़े धर्म ग्रंथों तथा वेदों का कंठस्थ रूप में मौखिक परंपरा द्वारा आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व होने के प्रमाण उपलब्ध हैं। मौखिक परंपरा में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते हुए इन्हें लिपिबद्ध करने में सहस्रों वर्ष लगे होंगे। लोकसाहित्य में गायन की विभिन्न विधाओं का वृहद संग्रह प्राप्त होता है। अतः लोकसाहित्य लोक गायन विधाओं में  ही पुष्पित-पल्लवित हुआ। लोक गायन परंपरा एक युग की सांस्कृतिक धरोहर है।

हिमाचल प्रदेश के संदर्भ में यह बात बिल्कुल सार्थक प्रतीत होती है। एक ऐसा प्रदेश जहां विभिन्न साहित्य और लोक जीवन में सांस्कृतिक विविधता परिलक्षित होती है, जो भारत के किसी अन्य प्रदेश में दृष्टिगत नहीं  होती। भाषा के विकास के साथ ही लोक गायन परंपरा को संरक्षित करने का साधन प्राप्त हुआ जिसे लिखित रूप में  लोकसाहित्य के अंतर्गत संग्रहित किया गया। लिखित रूप में  लोक गायन की विभिन्न विधाएं तो उपलब्ध हो सकती हैं, परंतु उनकी धुन, गायन शैली, भाव, लय आदि प्राप्त नहीं होते। जनमानस की भावाभिव्यक्ति तो व्यावहारिक रूप से गायन शैलियों द्वारा ही संप्रेषित हो सकती है। गद्य की अपेक्षा पद्यात्मक गायन अधिक भावपरक एवं हृदयग्राही होता है। लोक गायन के बिना लोकसाहित्य निर्जीव है। लोक गायन विधाएं मुख्य रूप से लोक गीत, लोक गाथाएं, लोक नाट्य और लोक नृत्यों के गीत हैं। लोकसाहित्य की अन्य विधाएं गेय नहीं  हैं, अतः उनका संग्रह आसानी से किया जा सकता है। गेय विधाओं का लिखित रूप तो साहित्य के अंतर्गत संरक्षित किया जा सकता है, परंतु गेय पक्ष को लिखा नहीं जा सकता। शास्त्रीय संगीत में स्वरलिपि पद्धति को गायन के तत्त्वों के संरक्षण हेतु प्रयुक्त  किया जाता है। यही पद्धति लोक गीतों की धुन, ताल, लय तथा अन्य विशेषताओं जैसे मींड, गमक, मुर्कियां, कण स्वर आदि को दर्शाने के लिए प्रयुक्त होते हैं। यह कार्य शास्त्रीय संगीत का ज्ञान रखने वाले व्यक्ति और ज्ञान रखने वाले शोध जिज्ञासु भली प्रकार कर सकते हैं। लिखित साहित्य भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना गेय स्वरूप। गायन विधाओं में सबसे समृद्ध विधा लोक गीत है। मानव जीवन में  जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत विभिन्न पड़ाव आते हैं। इन अवसरों पर विभिन्न संस्कार संपन्न किए जाते हैं तथा इन सभी अवसरों पर मनाए जाने वाले संस्कार के अनुरूप ही लोक गीत भी गाए जाते हैं। भारतीय सनातन परंपरा के अनुसार जीवन के सोलह संस्कार माने गए हैं, परंतु इनमें से कुछ संस्कार ही लोक जीवन में  व्यावहारिक रूप से मनाए जाते हैं। प्रदेश के प्रत्येक जिले में  जन्म, अन्नप्राशन, मुंडन, विद्यारंभ उपनयन, विवाह आदि संस्कार प्रायः सभी मनाते हैं और इनके उपलक्ष्य पर अनेक गीत गाए जाते हैं। अंत्येष्टि संस्कार तो विश्व के हर समुदाय में किया जाता है, परंतु ऐसे अवसर पर गीत कम ही गाए जाते हैं। हिमाचल प्रदेश के लोक संगीत के अंतर्गत अल्हैणियां गायन का संदर्भ प्राप्त होता है। इन्हें शोक गीत कहा गया है। यह गायन विधा अब प्रचार में  नहीं है। विभिन्न संस्कार गीतों के अतिरिक्त भक्ति गीत, देवी-देवता, ग्रामीण देवता, कुल देवता, देव-यात्रा में  देवता नचाने के गीत आदि असंख्य लोक गीत गाए जाते हैं जिनके कुछ संग्रह भी उपलब्ध हैं, लेकिन इन गीतों की गायन शैलियां, ताल और लय भिन्न-भिन्न हैं, जो लिखित रूप में नहीं प्रकट की जा सकती। अन्य गायन शैलियों  के प्रकारों में मुख्य रूप से लामण, झूरी, गंभरी, सिया, छिंज, छिंझोटी, बारहमासा, पक्खड़ू, भ्यागड़ा, कुंजड़ी-मल्हार, ढोलरू आदि हैं। इनमें से कुछ गायन शैलियां  लुप्त होने की कगार पर हैं और कुछ लुप्तप्राय हो गई हैं। लामण और झूरी इसी श्रेणी में आते हैं। इनका साहित्य तो उपलब्ध है, परंतु गायन शैली के गायक कुछ ही वयोवृद्ध कलाकार हैं। महिलाएं प्रायः प्रातःकाल भ्यागड़ा गाया करती थीं। पहाड़ी बोली में सुबह के लिए भ्याग शब्द प्रयुक्त होता है।

आज भ्यागड़ा और पक्खड़ू गायन कहीं सुनाई नहीं देते। इसी प्रकार लोक गाथाओं का तो काफी संग्रह प्राप्त होता है, परंतु गायन शैलियां लुप्त हो गई हैं। हारुल वीरगाथाएं हैं, सती चैंखी जैसी अन्य सतियों की गाथाएं, पानी के लिए महिलाओं के बलिदान की गाथाएं, ऐतिहासिक व सामाजिक गाथाओं का समृद्ध भंडार है, परंतु गायन संभवतः इन्हें लंबा होने के कारण गेय रूप में जन साधारण तक पहुंच नहीं पाईं और कालांतर में लुप्त हो गईं। लोक नाट्यों की हिमाचल प्रदेश में समृद्ध परंपरा रही है, परंतु नाट्यों का पारंपरिक गायन पक्ष लुप्त हो गया है। कुछ लोक नाट्य भी काल-कलवित हो चुके हैं। लोक नाट्यों के साथ बहुत से नृत्य भी अभिनीत किए जाते हैं, जिनसे नाट्य के कथानक का रूप स्पष्ट होता है। लोक नृत्य तो गायन के बिना अर्थहीन प्रतीत होते हैं। नृत्यों में भावाभिव्यक्ति नृत्य के साथ गायन के द्वारा ही होती है। कुछ नृत्य शैलियों के गीत उपलब्ध नहीं  हैं, अतः उनका अस्तित्व भी संकट में ही है। लोक गायन परंपराओं  ने ही लोकसाहित्य को संरक्षित रखा हुआ है। इस दिशा में महिलाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान है। महिलाओं ने ही इस विरासत को संजोए रखा है।