विलुप्त होती प्राचीन परंपरा, लोक हास्य-व्यंग्य में सीठणी

By: May 2nd, 2021 12:04 am

हिमाचल प्रदेश बारह जिलों और छोटे-छोटे जनपदों, घाटियों में बसा प्रदेश है। लगभग हर घाटी की अपनी एक समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा है। कमोबेश कुछ परंपराओं के निर्वहन में आस-पास के समाजों और कई बार आयात परंपराओं का समावेश भी देखने सुनने को मिलता है। इनमें वैवाहिक परंपराएं कुछ तो यथातथ्य पारंपरिक रूप से चल रही हैं तो कुछ में यत्र-तत्र अनेक परिवर्तन परिलक्षित होते हैं। यह लोगों के दूसरे क्षेत्रों में आने-जाने से संभव हो पाया है। लोकगीतों का हर लोक संस्कृति में अपना खास महत्त्व है।

लोकगीत हिमाचल की संस्कृति की आत्मा हैं। ऐसे में अन्य गीतों की ही तरह विवाह कार्यक्रमों में महिला संगीत का अपना अलग महत्त्व है। यदि किसी विवाह समारोह में विभिन्न अवसरों पर महिलाएं गायन हेतु न पहुंचे तो आज भी कुछ सूना-सूना सा लगता है। विवाह गीतों में गीतों का वैशिष्ट्य अपना अलग स्थान रखता है। लड़की के विवाह में सुहाग गीतों की प्रधानता रहती है तो लड़के के विवाह में घोड़ी गायन के साथ लोक भाषा के धार्मिक भजन भी गाए जाते हैं। बधावा लगभग दोनों प्रकार के विवाहों की शोभा होता है। इनमें सीठणी का अहम स्थान है। यह दोनों ओर गाई जाती है। लड़की के विवाह में यह सर्वोपरि रहती है। सीठणी एक प्रकार की गायन विधा में एक प्रकार की शालीन व्यंग्यात्मक गाली सी होती है जो हास्य उत्पन्न करती है। प्रायः बारात किसी ऐसे स्थान से आई होती है जिसका महिलाओं विशेषकर नई बहुओं और बेटियों को ठीक से पता नहीं होता। उन्हें उस गांव या क्षेत्र विशेष के लोगों के नाम भी नहीं आते। इसलिए पहले तो अनाम नाम या रिश्ते (जैसे दूल्हे का भाई, दूल्हे का पिता आदि के साथ परिधानों के रंग को इंगित कर भी) से उच्चारण होता है। और यदि किसी ने कुछ विशिष्ट नाम बता दिए तो फिर सोने पर सुहागा।

यह गायन पहले भात पर होता है। बारातियों को जब भोजन कराया जाता है तो आंगन में पंगत में बैठे लोगों में से किसी का नाम लेकर गाया जाता है तो अन्य बाराती उसे इंगित कर हंसते हैं। स्वागत करते लोग भी आस-पास खड़े हंसते हैं। यह हंसना और सीठणी का स्वीकार मित्रता के सूत्रों को प्रगाढ़ता प्रदान करता है। पहले बारात प्रायः रात को ही आती थी। तब जहां उसे ठहराया जाता था वहां भोजनोपरांत महिलाएं और पुरुष अलग-अलग समय पर उनसे मिलने जाया करते थे। सीठणी में पहले महिलाएं बैठक गाती हैं। उसके बाद फिर कुछ और गीत गाए जाते हैं जो भोजन के समय से भिन्न होते हैं और कभी उनका पुनर्गायन भी होता है। विवाह के अवसर पर तब हंसी का ऐसा माहौल कि जो देखते-सुनते ही बनता है। गीतों-गीतों में मित्रता के ये सूत्र कई बार ऐसे बन जाते हैं कि बाद में न जाने कितने रिश्ते-नाते जुड़ जाते हैं। सीठणी की यह परंपरा अब लुप्त होती जा रही है तथा इसके संरक्षण की जरूरत है।