चीखों के बीच शंखनाद

By: May 13th, 2021 12:05 am

क्या कबूतरों को उड़ा कर, आसमानी बाज़ का पीछा होगा। धरती का विकार हैं, ऊंचे युद्ध का नाद नहीं। जमीनी हकीकत के सिफर पन्नों पर लिखावट का सौंदर्य भी मजबूर है, क्योंकि यहां जब जरूरत थी तो मेहरबान नींद में थे। कुछ यही हाल है हिमाचल में स्वास्थ्य सेवाओं की तकदीर का और उस पर भी मलाल यह कि सारे संबोधन आलोचना को कुंद करना चाहते हैं। सारी स्थिति का जायजा लेते हमारे स्वास्थ्य मंत्री अब घूम रहे हैं या इन चीखों के बीच कोई नया शंखनाद होगा। वैज्ञानिक समाधान की तमाम संभावनाओं के बीच राजनीतिक इरादों की खनक को एक तरफ करके यह सोचें कि व्यवस्था क्यों मजबूर रही या हो रही। पिछले एक साल का महाभारत किसी सियासत की जीत हार के लिए नहीं था,बल्कि यह कोरोना को हराने का यत्न और प्रयत्न था। हम चले तो चौबे बनने, लेकिन दुबे भी नहीं बने। पिछले साल केंद्र से कुल 750 वेंटिलेटर मिले, जिनमें से ढाई सौ वापस करने के बावजूद हिमाचल अपनी क्षमता में पूरी सांसें नहीं भर पाया। आश्चर्य यह कि साल भर की करवटों में इतना दम भी नहीं रहा कि पांच सौ वेंटिलेटर पूरी तरह क्रियाशील हो जाते। आधे से कम वेंटिलेटर अगर आज चल रहे हैं, तो किस अस्पताल के आगे माथा रगड़ें या अपनी कृतज्ञता में प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री का स्वागत करें। हर कोई सुर्खियां बटोरना चाहता है, लेकिन इस हमाम की इबारत बताती है कि भीतर कौन क्या है। हम अपाहिज व्यवस्था के मुखौटों पर नाज करते हैं और सरकारी तितलियों के भरोसे खुशी का इजहार करते हैं, जबकि हकीकत यह है कि सरकार के कान सिर्फ अपना कहा ही सुनते हैं। आश्चर्य यह कि हमने मरने वालों को भी भीड़ बना दिया और किसी लाश में लिपटे कफन की दास्तान तक नहीं सुनी। कितनी कहानियां स्वास्थ्य व्यवस्था के भीतर घूम रही हैं और कितने प्रभावशाली लोग प्रदेश के इसी ढांचे से बचने के लिए चंडीगढ़-जालंधर निकल गए, लेकिन जिन्हें आज भी सरकार के भरोसे जान बचानी है उन्हें उपकार नहीं, उपचार की दरकार है।

 बढ़ते मामलों का प्रकोप और आंकड़ों का शोक जिस किसी घर की तलाशी ले रहा है, उन आहों का जिक्र भर बता देता है कि इन गलतियों से हम सीखे नहीं। बेशक व्यवस्था के बीच कोरोना की शहादतों में कई जाबांज योद्धा गिने जाएंगे, लेकिन इस युद्ध में कोई ताजमहल बनाने की कोशिश न करे, यह विनती अब जनता करने लगी है। किसी को तमाशबीन बनने का हक नहीं, चाहे नेता हों,या जनता। यह दीगर है कि जनता के सवाल जायज हैं, लेकिन ये सियासत का ईंधन नहीं। यहां सवाल उस सियासत से है, जो कुछ समय पहले स्थानीय निकाय चुनावों में यह भूल गई थी कि देश में कोरोना की दूसरी लहर पांव पसार चुकी थी। अपने सामाजिक समारोहों में हम भूल रहे थे कि हमारे बीच कोविड काल गुजर रहा था। बहरहाल अब यह देखना होगा कि हिमाचल के दोनों प्रमुख दल जो पंचायत चुनाव परिणामों के बाद अपने-अपने दावों की छाती पीट रहे थे, उनके कार्यकर्ता कहां हैं। विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के पन्ना प्रमुख अगर समाज में अपनी भूमिका तराशें, तो कोविड संक्रमितों को एंबुलेंस सड़क पर नहीं पटकेगी और न ही मृत्यु होने पर उस लाश को कचरे की गाड़ी में ढोया जाएगा। हिमाचल का हर विधायक व पूर्व विधायक इतनी हैसियत तो रखते होंगे कि वे फील्ड में उतर कर तमाम संक्रमितों को होम आइसोलेशन में मददगार हाथ साबित हों। बहुत सारे ऐसे दायित्व हैं जहां राजनीति अपने हाथियों से नीचे उतर कर समाज के साथ चलने की जरूरत को समझ सकती है। यह इसलिए कि हर संक्रमित को अस्पताल की जरूरत नहीं और अगर ऐसे नब्बे फीसदी लोगों का कुशलक्षेम पूछा जाए, तो न केवल व्यवस्था सुधरेगी, बल्कि जीवन बचाने में निचले स्तर तक सहयोग होगा।