सांसों की नई ‘संजीवनी’

By: May 10th, 2021 12:02 am

कोरोना वायरस की घुटन से जिनकी सांसें उखड़ रही थीं, अब उन्हें जल्द राहत मिल सकती है, क्योंकि एक और ‘संजीवनी’ की तलाश सार्थक हो गई है। रक्षा मंत्रालय के डीआरडीओ के वैज्ञानिकों के प्रयोग और परीक्षण सफल रहे हैं, नतीजतन एक और संपूर्ण स्वदेशी दवा का आविष्कार हुआ है-2 डीजी। यानी 2 डीऑक्सी-डी-ग्लूकोज। चूंकि विशेषज्ञ समूह की अनुशंसा पर भारत सरकार के औषधि महानियंत्रक ने इस स्वदेशी दवा के आपात इस्तेमाल की मंजूरी दे दी है, लिहाजा डा. रेड्डी लैब के सहयोग से दवा का उत्पादन होगा और 7-10 दिनों के अंतराल में यह ‘संजीवनी’ बाजार में उपलब्ध हो सकती है। एक कोविड रोधी टीके के बाद कोविड रोधी दवा…! यकीनन यह हमारे वैज्ञानिकों के बौद्धिक अनुसंधान का करिश्मा है। 2-डीजी को जीवन-रक्षक औषधि माना गया है, क्योंकि इसके मानवीय परीक्षणों के निष्कर्ष हैं कि दवा के सेवन से आक्सीजन की निर्भरता कम होगी। कोविड के जिन मरीजों को लगातार 7 दिनों तक दवा का घोल पिलाया गया, उनकी आक्सीजन ठीक स्तर पर रही और उनकी आरटी-पीसीआर रिपोर्ट भी नेगेटिव आई। यह दवा ग्लूकोज की तरह पाउडर के रूप में उपलब्ध होगी।

 इसे पानी में घोल कर सुबह-शाम मरीज को दिया जा सकता है। अलबत्ता अंतिम निर्णय डाक्टर का ही होगा कि वह कितनी डोज बताता है। दवा के रूप में इस महान उपलब्धि की शुरुआत अप्रैल,2020 में हुई, जब  भारत में कोरोना संक्रमण आकार ग्रहण करने लगा था। देश भर में लॉकडाउन की स्थिति थी। औषधि का महत्त्वपूर्ण दूसरा परीक्षण मई-अक्तूबर के दौरान किया गया, जब सितंबर में कोरोना की पहली लहर अपना ‘चरम’ छू कर ढलान की ओर बढ़ने लगी थी। तीसरा महत्त्वपूर्ण परीक्षण दिसंबर,’20 और मार्च,’21 के दौरान किया गया, जिसका संजीवन रूप अब देश के सामने है। इतना ही नहीं, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु, कर्नाटक, दिल्ली, उप्र आदि राज्यों के 27 अस्पतालों में कोविड मरीजों पर व्यापक परीक्षण किए गए। बताया जा रहा है कि नतीजे बेहद सुखद और सकारात्मक रहे। दरअसल यह कोविड की ‘किलिंग एजेंट’ दवा नहीं है। यानी वायरस को मारने का काम नहीं करती, बल्कि वायरस को शुरू में ही विस्तार से रोकती है। संक्रमित कोशिकाओं तक ही पहुंचना इस दवा की खासियत है। इससे मरीज में संक्रमण के लक्षण जल्दी खत्म हो जाते हैं। डीआरडीओ के नाभिकीय औषधि एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान ने डा. रेड्डी लैब के सहयोग से यह दवा विकसित की है। फिलहाल यह दवा अस्पतालों को ही मुहैया कराई जाएगी।

 उनके जरिए परीक्षण के जो डाटा सामने आएंगे, उन्हें अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल्स में प्रकाशित किया जाएगा। ऐसी प्रक्रिया से दवा की प्रभावशीलता को सत्यापित किया जा सकेगा। दवा के अनुसंधान से जुड़े वैज्ञानिकों का दावा है कि 2-डीजी कोविड की किसी भी नस्ल और रूप पर कारगर साबित होगी, लिहाजा दवा को अंतरराष्ट्रीय पहचान और बाजार भी मिलेंगे। फिलहाल डीआरडीओ-रेड्डी कंपनी का फोक्स भारत के कोविड मरीजों पर ही है,क्योंकि आक्सीजन का संकट एक संवेदनशील मुद्दा बनकर सामने आया है। आक्सीजन की कमी के कारण कई मरीजों की मौत भी हुई है। बेशक 2-डीजी आक्सीजन का विकल्प नहीं है, लेकिन प्राण वायु पर किसी भी बीमार की निर्भरता को बेहद कम करना भी मानवीय उपलब्धि होगी। कोरोना के त्रासद काल की यह दवा एक नई उम्मीद, ‘रामबाण, साबित हो सकती है। दावा यह भी किया गया है कि 42 फीसदी मरीजों की आक्सीजन निर्भरता तीसरे दिन ही खत्म हो गई। वैज्ञानिकों ने कोविड की पहली लहर के दौरान ही दवा के प्रयोगों को हैदराबाद की सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी की मदद से लैब में टेस्ट किया था। स्थापित मानकों पर मूल्यांकन करें, तो यह दवा लेने वाले मरीज दूसरे मरीजों की तुलना में अढ़ाई दिन पहले स्वस्थ हुए। बहरहाल 2-डीजी का स्वागत है। एक और स्वदेशी आयाम खुला है, जो यकीनन हमारी वैज्ञानिक सफलता का प्रतीक है।