लाहौली समाज में लुप्त होती घुरे गायन परंपरा

By: May 9th, 2021 12:05 am

अतिथि संपादक : डा. गौतम शर्मा व्यथित

हिमाचली लोक साहित्य एवं सांस्कृतिक विवेचन -30

विमर्श के बिंदु

-लोक साहित्य की हिमाचली परंपरा

-साहित्य से दूर होता हिमाचली लोक

-हिमाचली लोक साहित्य का स्वरूप

-हिमाचली बोलियों के बंद दरवाजे

-हिमाचली बोलियों में साहित्यिक उर्वरता

-हिमाचली बोलियों में सामाजिक-सांस्कृतिक नेतृत्व

-सांस्कृतिक विरासत के लेखकीय सरोकार

-हिमाचली इतिहास से लोक परंपराओं का ताल्लुक

-लोक कलाओं का ऐतिहासिक परिदृश्य

-हिमाचल के जनपदीय साहित्य का अवलोकन

-लोक गायन में प्रतिबिंबित साहित्य

-हिमाचली लोक साहित्य का विधा होना

-लोक साहित्य में शोध व नए प्रयोग

-लोक परंपराओं के सेतु पर हिमाचली भाषा का आंदोलन

लोकसाहित्य की दृष्टि से हिमाचल कितना संपन्न है, यह हमारी इस शृंखला का विषय है। यह शृांखला हिमाचली लोकसाहित्य के विविध आयामों से परिचित करवाती है। प्रस्तुत है इसकी 30वीं किस्त…

प्रो. हेमराज भारद्वाजए मो.-9459293000

लाहुल में जो गाथाएं गीत रूप में उपलब्ध हैं, उन्हें ‘घुरे गीत’, ‘यरगीत’ अथवा ‘गाथा गीत’ की संज्ञा दी गई है। घुरे शब्द की उत्पत्ति चंबा के प्रसिद्ध लोक नृत्य ‘घुरई’ से मानी जाती है। घुरे की उत्पत्ति और परंपरा के संबंध में ठोलंग गांव के राम देव कपूर कहते हैं कि लाहुल के यायावारी प्रवृत्ति के गद्दी लोगों को ही इनकी धुन बनाने, स्वरबद्ध करने तथा प्रचलन में लाने का श्रेय दिया जाता है। घुरे का एक मुखड़ा या अंतरा जब ये तैयार करते थे तो ‘छिर’ अर्थात गाची में एक गांठ दिया करते थे ताकि उसे भूल न जाएं। इस तरह उस गीत के हर अंतरे तैयार करने के बाद छिर में एक गांठ लगा दी जाती, इस तरह घुरे की निर्माण प्रक्रिया पूरी होती थी। गद्दियों के घुमंतू होने के कारण इन घुरे गीतों में विभिन्न स्थानों के शब्दों का मिश्रण भी देखा जा सकता है। लाहुल के गाहर घाटी के क्षेत्र में कुछ ‘ग्रेग्स गीत’ भी प्रचलित हैं जिनकी भाषा तिब्बती मानी जाती है। लाहुल के लोकगीतों तथा लोकगाथाओं के संबंध में यह तो सर्वविदित है कि लोकगीतों को स्त्रियों अथवा पुरुषों द्वारा कभी भी, कहीं भी गाया जा सकता है। इसके साथ विभिन्न वाद्ययंत्रों तथा नृत्य का भी समन्वय हो सकता है, किंतु घुरे गायन केवल विशेष अवसर पर ही होता था।

इसमें नृत्य और वाद्ययंत्रों का प्रयोग वर्जित है। इसका गायन भी केवल पुरुषों द्वारा ही होता है। सतीश लोपा के अनुसार अब इसमें परिवर्तन देखा गया है। अब इनका गायन कभी भी धार्मिक समारोह के अतिरिक्त सांस्कृतिक कार्यक्रम में मनोरंजन आदि के लिए होता है और इसमें महिला और पुरुष दोनों ही भाग लेते हैं। प्रो. हीरा लाल ठाकुर कहते हैं कि यहां के लोग इन्हें प्रेम व श्रद्धा के साथ इनका गायन व श्रवण करते हैं। गायक भी पहले इन्हें अति पवित्र भाव तथा पूरे विधि-विधान के साथ गाते थे। इनका गायन प्रारंभ करने से पूर्व यहां के लोग देवताओं का स्मरण-आराधना करके हवन किया जाता है, जिसमें अग्नि को देवदारु की पत्तियों, पुष्पों, जौ, घृत आदि से तृप्त किया जाता था। लाहौली लोकसाहित्य में कुछ सामाजिक घुरे जैसे ‘यूंदेरी ध्याड़ी फागुड़ी जातरे जी हो, भाई चार बगले अंदरे जी हो 33॥’ इस घुरे में लाहौल के फागली उत्सव के बारे मे चर्चा की है।  इसमें बड़े बूढ़ों में कुछ गुणीजन भविष्य के बारे में कुछ घटनाओं की घोषणा भी करते हैं। इस तरह यह घुरे अपनी पुरानी सामाजिक घटनाओं को आज भी सुरक्षित किए हुए हैं। इसी तरह ‘तौसे गे…ध्याड़ी तून्देरी पोरी ए। ए त्रिलोकी नाथेरी दरुशाने आई ए33333॥’ प्रस्तुत घुरे में त्रिलोकीनाथ गांव में लगने वाले पौरी मेले का वर्णन मिलता है जो कि तुन्दे नामक गांव में लगता है। तुन्दे त्रिलोकनाथ का पुराना नाम है। यहां बौद्ध धर्म से संबंधित कुछ घुरे प्रचलन में हैं जैसे ‘ऊपरु घन्टाले री डोशा भुई, तान्दी घुंशाले साला बिगुड़ी 3333।’ प्रस्तुत घुरे में गुरु घंटाल गोंपा के मुख्य लामा का गोंपा छोड़ के जाने की कथा है। गोंपा में पूजा-अर्चना की अनिश्चितता के कारण मुख्य लामा लोगों से नाराज़ होकर लद्दाख चला जाता है। लामा के चले जाने से घुशाल और तान्दी नामक गांव की फसलों का बहुत ही बुरा हाल होता है। पंचायत प्रधानों की बैठक में लामा को बुलाने के लिए दो व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता है। जब लामा वापस लाहुल पहुंचता है तो यहां की स्थिति फिर से सामान्य हो जाती है। ‘अन्चेला बन्चेला दुये जोड़ी बेणी जी। भोला बन्चेला गुरुदाने व्याही जी 33333॥’ प्रस्तुत घुरे गीत में बौद्ध धर्म से संबंधित एक बांझ स्त्री को प्रभु गोरखनाथ की कृपा से पुत्र फल की प्राप्ति की कथा का वर्णन मिलता है। कुछ घुरे ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से संबद्ध हैं, यथा ‘ए घूषेरी पाणू डाणा शूकारा गेयी जे। ए कूला शूकी सूरणी शूकी पाणी ना ए टीपू जे 33333333॥ ए रूपी याना राणी जे बाटा सू देन्दा जे। ए रूपी याना राणी जे मेणी अरुजाना शुणी जे 33333॥’ इस घुरे में रूपी राणी के आत्म बलिदान की गाथा का वर्णन है। रूपी राणी चंबा के राजा की बहन थी। इसका विवाह घूशाल के राणा परिवार में हुआ था। लोक गाथानुसार यह कहा जाता है कि लाहुल के इस गांव में बहुत पहले पानी का अभाव था। रानी की बलि के बाद इस गांव में जलधारा प्रवाहित हुई थी।

‘जब थीए, राजा पाण्डरू तब थीए, नऊ गज माणु हो-2 जब थी, राजा पाण्डरू तब थी, सत गज जनाना हौ 333॥’ प्रस्तुत लाहौली घुरे में पांडवों के समय का चित्रण देखने को मिलता है कि उस समय का जनजीवन कैसा था। गाथा बताती है कि पांडवों के जमाने में नौ-नौ गज मनुष्य की लंबाई होती थी। चिडि़या का दूध होता था। घोड़े के सींग होते थे और अनाज़ का एक दाना एक-एक सेर का होता था। इस तरह की आज तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। सम्पूर्ण घुरे गीत के लिए सतीश लोपा की गीत-अतीत पुस्तक अथवा हीरा लाल रशपा, शेर सिंह फकीरु और श्याम लाल करोपा द्वारा गाई गई वीडियो सीडी ‘गीत-अतीत’ का अवलोकन किया जा सकता है। केलांग निवासी प्रो. के. अंगरूप गाहर घाटी के घुरे गीत के संबंध में कहते थे कि इस क्षेत्र के गाथागीत में प्रेम कथाओं तथा संस्कार कथाओं की बहुलता है जबकि इनके कथानकों का आकार लघु है तथा इनमें वीर गाथाओं का अभाव है। घुरे गीतों को रेडियो के माध्यम से आम जन तक पहुंचाने में तथा इनके संरक्षण में ठाकुर दास और कुनज़ंग जी का स्थान अति महत्वपूर्ण रहा है। आज लोग अपनी पुरानी परंपराओं को पीछे छोड़ आगे बढ़ना चाहते हैं। फलतः बहुत सी परंपराएं और विश्वास धीरे-धीरे लुप्त हो रहे हैं। उन्हीं में से एक है लाहुल की घुरे गायन परंपरा जो यहां अपनी अंतिम सांसें गिन रही है। आज की युवा पीढ़ी से यहां के सम्पूर्ण लोकसाहित्य के बारे में जानकारी प्राप्त करना शायद कठिन हो सकता है। मनोरंजन के साधन मोबाइल और इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव के कारण अब इस क्षेत्र की युवा पीढ़ी भी लोक उत्सवों में रुचि लेती नज़र आ रही है। उन्हीं में से एक हैं जसरथ गांव के शिक्षक देव जस्पा जो इस तरह स्थानीय संस्कृति को सोशल मीडिया जैसे फेसबुक और यू-ट्यूब में दिखाकर स्थानीय संस्कृति को दूरदराज के क्षेत्रों में पहुंचा रहे हैं।