कोचिंग में पांव जमा रहा मंडी

By: Apr 21st, 2021 12:06 am

हिमाचल प्रदेश में कोचिंग व एकेडमी का चलन बहुत पहले से जारी है, लेकिन अब वक्त के साथ इनकी जरूरत बढ़ने लगी है। 90 के दशक से इक्का-दुक्का अकादमियों के साथ शुरू हुआ सिलसिला अब सैकड़ों का आंकड़ा पार कर गया है। बड़ी नौकरी की ख्वाहिश लिए बाहर जाने वाले छात्रों के लिए ये अकादमियां कहीं न कहीं उन्हें घर में तैयारी कर एचएएस-आईएएस-डाक्टर-इंजीनियर बनने की उम्मीद दे रही हैं। देवभूमि के रूप में विशेष पहचान रखने वाले जिला मंडी में क्या है कोचिंग सेंटर्स का हाल, किन विषयों में दाखिले के लिए है सबसे ज्यादा मारामारी… बता रहे हैं अमन अग्निहोत्री

सांस्कृतिक, साहित्यिक व देवभूमि के रूप में विशेष पहचान रखने वाला मंडी जिला अब शिक्षा हब के रूप में भी पहचान बना रहा है। आईआईटी मंडी, मेडिकल यूनिवर्सिटी नेरचौक, श्री लाल बहादुर मेडिकल कालेज नेरचौक, डेंटल कालेज सुंदरनगर, राजकीय आयुर्वेदिक बी-फार्मेसी कालेज जोगिंद्रनगर, जिला की एकमात्र अभिलाषी यूनिवर्सिटी, डा. यशवंत सिंह परमार औद्योनिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय थुनाग, सरकाघाट सैनिक अकादमी और क्लस्टर यूनिवर्सिटी मंडी जैसे संस्थानों ने जिला को शिक्षा के क्षेत्र में आज एक विशेष स्थान पर ला खड़ा कर दिया है। अगर बात कोचिंग सेंटर को लेकर की जाए, तो मंडी जिला ने भी इस क्षेत्र में अपने कदम जमाने शुरू कर दिए हैं। मंडी जिला में भी कई कोचिंग सेंटर अब इंजीनियरिंग, नीट, बैकिंग, टेट, कमीशन, सरकारी क्षेत्र, एनडीए, जेबीटी, वेटरिनरी साइंस, होर्टिकल्चर, एग्रीकल्चर, बीएससी नर्सिंग और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर परिणाम दे रहे हैं, लेकिन फिर भी इस मामले में मंडी जिला राजधानी शिमला और हमीरपुर से कुछ पीछे खड़ा जरूर नजर आता है। ऐसा नहीं है कि मंडी में कोचिंग सेंटर नहीं हैं और यहां बडे़ एग्जाम की तैयारी नहीं करवाई जाती है, लेकिन इस दौड़ में जिला से बच्चों और अभिभावकों की पहली पसंद प्रदेश के बाहर या फिर अन्य जिला ही बन रहे हैं। हालांकि सरकारी क्षेत्र, टेट, जेबीटी, बैंकिंग और पुलिस व सेना भर्ती की बात हो, तो मंडी जिला के कोचिंग सेंटर ने कमाल कर दिखाया है। सरकारी नौकरियों की बात हो या टेट, कमीशन व अन्य प्रतियोगी परिक्षाओं में पूरे प्रदेश में सबसे बेहतर रिजल्ट देने का तमगा मंडी जिला के कोचिंग सेंटर के नाम पर है। इस मामले में भी एजुकेशन प्वाइंट मंडी ने पूरे प्रदेश में अपनी पहचान बनाई है। इसी तरह एसआर विद्या मंदिर, श्री चैतन्या सुंदरनगर, संकल्प क्लासेज, माइंड ऑपरेशन अकादमी सहित अन्य कई ऐसे नाम हैं, जिन्होंने अपनी विशेष पहचान पिछले कुछ समय में बनाई है। मंडी में इस समय छोटे-बडे़ मिलाकर 300 से अधिक ऐसे कोचिंग सेंटर हैं, जो विभिन्न प्रकार की ट्यूशन के अलावा जेईई, नीट, टेट, जेबीटी, पटवारी, बैंकिंग, क्लर्क, सेना भर्ती और अन्य प्रकार की कोचिंग दे रहे हैं।

ट्यूशन पर ज्यादा जोर

मंडी में 300 से अधिक कोचिंग सेंटर काम कर रहे हैं। इनमें बहुत कम ऐसे संस्थान हैं, जहां नीट, जेईई की कोचिंग दी जाती है। जिला में ज्यादातर कोचिंग सेंटर का जोर ट्यूशन पर ही है। जिला में पूरा दिन इन कोचिंग सेंटर में पांचवीं कक्षा से लेकर जमा दो तक की ट्यूशन का जोर चलता है। कई ऐसे ट्यूशन सेंटर को तो सरकारी अध्यापक भी गुपचुप चला रहे हैं। इन सेंटर्स में मैथ्स, इंग्लिश, फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी के अलावा जीके और हिंदी तक भी कोचिंग दी जा रही है।

शिक्षा के लिए खतरा

मंडी जिला के सबसे बडे़ और सबसे प्रतिष्ठित स्कूल के प्रधानाचार्य और जाने-माने शिक्षाविद केसी गुलेरिया कोचिंग सेंटर को लेकर अपनी बेबाक राय रखते हैं। उनका मानना व कहना है कि कोचिंग सेंटर की कोई जरूरत नहीं है। श्री गुलेरिया कहते हैं कि हाल ही में जारी हुई यूनेस्को की वैश्विक शिक्षा निगरानी रिपोर्ट में भारतीय शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी कुछ खामियां बताई गई हैं। इस रिपोर्ट में प्राइवेट ट्यूशन और प्राइवेट कोचिंग को भारतीय शिक्षा के लिए एक खतरा बताया गया। रिपोर्ट के मुताबिक प्राइवेट ट्यूशन और कोचिंग से बच्चों में पढ़ाई का बोझ बढ़ता जा रहा हैं और प्राइवेट कोचिंग का यह बोझ न केवल बच्चों पर मानसिक असर डालता है। वहीं, अभिवावकों की आय पर भी जोरदार चपत लगाता है। शहरी क्षेत्रों में कोचिंग की एक होड़ सी मच गई है। आज लोगों में एक गलत अवधारणा सी बन गई है कि कोचिंग सेंटर जाने से ही बच्चे नीट या जेईई जैसे एग्जाम पास कर सकते हैं, इसलिए आज गरीब से गरीब मां-बाप भी अपना पेट काट कर बच्चों को कोचिंग में डालना चाहता है। यहां मैं एक बात स्पष्ट करना चाहता हूं कि कोई भी कोचिंग सेंटर नीट व जेईई को पास करने की 100 प्रतिशत गारंटी नहीं लेता। अगर हम थोड़ा विस्तार से देखें, तो हम पाते हैं कि लाखों बच्चों की एडमिशन के बाद भी बहुत कम बच्चे इन कोचिंग सेंटर्स से इन प्रतियोगियों को उत्तीर्ण कर पाते हैं। इसे प्रतिशत में निकला जाए, तो पांच प्रतिशत से भी कम है। वहीं, अगर हम स्कूलों की बात करें, तो ऐसे बच्चों का प्रतिशत अधिक होगा, जो विद्यालयों से सीधे इन प्रतियोगिताओं को उत्तीर्ण कर गए हैं। यहां एक बात विशेष रूप से कहना चाहता हूं कि स्कूलों का पाठ्यक्रम और सिलेबस एनसीईआरटी द्वारा निर्धारित किया गया होता है, जो कि बच्चों के स्तर को ध्यान में रखते हुए बनाया गया होता है, ताकि किसी बच्चे को किसी तरह का अवसाद या तनाव न हो। अगर यदि आप अपना लक्ष्य निर्धारित कर लें और उसके लिए अनुशासन के साथ कड़ी मेहनत कर लेते हैं, तो आपको किसी कोचिंग सेंटर जाने की आवश्यकता नहीं है।

एजुकेशन प्वाइंट ने बनाया नाम

नीट व जेईई की कोचिंग के मामले में एजुकेशन प्वाइंट, एसआर विद्या मंदिर, संकल्प क्लासेज और श्री चैतन्या ने अच्छा नाम बनाया है। इन संस्थान के अध्यापकों की कड़ी मेहनत की वजह से पिछले कुछ सालों में जेईई और नीट में कई बच्चों को सफलता मिली है। वहीं, एजुकेशन प्वाइंट ने तो पिछले कुछ वर्षों से एक विशेष पहचान बना ली है। सरकारी क्षेत्र में नौकरी, टेट, कमीशन, जेबीटी, क्लर्क, पटवारी और पुलिस भर्ती की लिखित परीक्षा में तो एजुकेशन प्वाइंट ने रिकॉर्ड परिणाम दिए हैं।

यह तो अब ट्रेंड ही बन गया

अभिभावक कांता ठाकुर कहती हैं कि यूं तो मुझे लगाता है कि कोचिंग की जगह स्कूल और सेल्फ स्टडी से ही बच्चों को अपना मुकाम पाना चाहिए, लेकिन आज के समय में कोचिंग भी एक टे्रंड बन गया है। प्रदेश में भी अब कई अच्छे कोचिंग सेंटर हैं, जो कि बाहर के मंहगे कोचिंग सेंटर की कमी को पूरा करते हैं। इसके अलावा ऑनलाइन कोचिंग का भी अच्छा सिस्टम अब शुरू हुआ है।

जरूरी नहीं, बन रही मजबूरी

अभिभावक अविनाष विस्ट भी मानते हैं कि कोचिंग जरूरी नहीं है, लेकिन मजबूरी जरूर बनती जा रही है, पर राहत की बात यह है कि अब हिमाचल प्रदेश में भी कोचिंग सेंटर बहुत अच्छा परिणाम दे रहे हैं। इसलिए दिल्ली, चंडीगढ़ या कोटा जाने की अब जरूरत नहीं रही है। अगल सेल्फ स्टडी और तकनीक की सहायता ली जाए, तो कोचिंग सेंटर में जाना जरूरी नहीं है।

यहां का स्टाफ हाईटेक नहीं

शिक्षाविद एवं हिमाचल राजकीय प्राथमिक अध्यापक संघ के प्रधान नरेश ठाकुर का कहना है कि हिमाचल प्रदेश में कोचिंग सेंटर में योग्य व अनुभवहीन स्टाफ  के कारण अच्छा परिणाम नहीं देते हैं। साथ ही टेक्नोलॉजी का भी उचित प्रयोग नहीं कर पाते है। न चाहते हुए भी अभिभावकों को बच्चों को कोचिंग करवानी पड़ रही है।

स्कूल टीचर भी तैयारी करवाने में सक्षम

भौतिकी विज्ञान के प्रवक्ता हंसराज ठाकुर कहते हैं कि जब तक शिक्षक को सिर्फ  शैक्षणिक कार्य करवाने हेतु नियुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक बच्चों को शायद कोचिंग की आवश्यकता पड़ती रहेगी। मंडी सहित कोई भी कोचिंग संस्थान तभी अपना नाम अच्छा करवा पा रहे हैं कि उन्हें सिर्फ और सिर्फ कोचिंग का ही कार्य करना है। पूरा सिलेबस और बेसिक टॉपिक्स बच्चों ने अपने अध्यापकों से पढ़े होते हैं। उन्हें प्रैक्टिकली कैसे कार्यान्वित करना है, यह शेष कार्य कोचिंग संस्थान करते हैं। इस क्षेत्र से जुड़े लोग बेहतर संस्थानों में कार्य करके पहले इसके प्रारूप को समझते हैं, फि र हिमाचल आकर अपने कोचिंग संस्थान खोलकर इस व्यवसाय में जुट जाते हैं। बच्चों का प्रथम उद्देश्य अच्छे अंकों से परीक्षा पास करना होता है। इसलिए स्कूलों में कम्पीटिटिव परीक्षाओं की मेन लाइन से हटकर तैयारी करते हैं और इन परीक्षाओं में पिछड़ जाते हैं और फि र अपने करियर हेतु कोचिंग संस्थानों का रुख करते हैं।

कोचिंग से ज्यादा जरूरी है सेल्फ स्टडी और अभिभावकों का योगदान

शिक्षाविद भारती बहल कहती हैं कि आजकल बच्चों ने पढ़ाई में ध्यान देना छोड़ दिया है, क्योंकि टीवी, मोबाइल इंटरनेट या दूसरे अन्य संसाधन बच्चों को पढ़ाई से विमुख कर रहे हैं। मंडी के कोचिंग सेंटर बच्चों के लिए भले ही हैं या बच्चों को बाहर भेजने में अभिभावक भलाई समझते हों, लेकिन मेरे हिसाब से कोचिंग सेंटर सिर्फ  स्पेसिफिक नोट्स प्रोवाइड करवाते हैं, लेकिन जो मुख्य काम पढ़ाई है, वह तो स्टूडेंट्स को खुद ही करनी पड़ती है। सबसे पहला कार्य है कि पेरेंट्स बच्चे को सेल्फ स्टडी में ले जाएं। सरकारी स्कूल की अध्यापिका होने के नाते मैं यह कहूंगी की मैंने कई बच्चे ऐसे भी देखे हैं, जो स्कूल टाइम या उसके बाद के फ्री टाइम में लाइब्रेरी में बैठकर या घर में ही स्टडी करके अपने लिए वह मुकाम हासिल कर लेते हैं और कुछ बच्चे ऐसे भी देखे हैं, जो कोचिंग सेंटर में जाकर उस जगह पहुंच तो जाते हैं, जो उन्हें चाहिए, लेकिन समय उनका बहुत बर्बाद हो जाता है।

बाहर के और यहां के सेंटर्स में दिन-रात का फर्क

शिक्षाविद एवं हिमाचल राजकीय अध्यापक संघ के जिला प्रधान अश्वनी गुलेरिया का कहना है कि जिला मंडी के कोचिंग सेंटर और बाहर के सेंटर्स में दिन-रात का अंतर है। यहां क्वालिटी कमजोर है। एक्स्पोजर बच्चों को बहुत कम मिलता है और लेटेस्ट पैटर्न के हिसाब से जो कोचिंग होती है, वह बाहर के कोचिंग सेंटर से कमजोर है और साथ में कोचिंग एक्सपर्ट बाहर के राज्य के अधिक योग्य और अनुभवी हैं। अगर सरकारी स्कूलों के अध्यापकों से अन्य काम बंद करवाए जाएं और उन्हें बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी तैयार करने का जिम्मा दिया जाए, तो फिर कोचिंग की जरूरत नहीं रहेगी, लेकिन वर्तमान हालात में यह अभिभावकों की मजबूरी बन चुका है।

आज की जरूरत बन गई है कोचिंग

मंडी में एजुकेश्न प्वाइंट चला रहे रितेश कहते हैं कि आज के समय में कोचिंग लेना बहुत जरूरी हो गया है। प्रतिस्पर्धा इस स्तर तक बढ़ चुकी है कि सबसे आगे रहकर भी मुकाम पाया जा सकता है। बेशक यह बात सही है कि अभी तक मंडी जिला में कोचिंग सेंटर इस लेबर पर पहुंच नहीं सके हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिला के सेंटर्स ने बेहतर परिणाम दिए हैं। यहां पूरी कोशिश की जा रही है कि बच्चों को जिला के बाहर न जाना पड़े। अभिभावकों को भी एक बात समझनी होगी कि प्राइवेट टीचर की ट्यूशन बच्चों का बेसिक बिगाड़ रही है, जबकि बच्चों को जरूरत जमा एक से सही कोचिंग की है, जिससे जमा दो का परीक्षा परिणाम भी बेहतर आएगा और जेईई व नीट में भी बच्चे सफल हो सकेंगे। सरकारी क्षेत्र, जेबीटी, टेट, कमीशन और अन्य क्षेत्रों की बात करें, तो मंडी जिला ने सबसे बेहतर परिणाम दिए हैं।

समर्थन से साकार होगा डीसी एसपी बनने का सपना

बेहतर कोचिंग की कमी से जूझ रहे मंडी जिला में प्रशासन ने भी एक बेहतर पहल चलाई हुई है। मंडी जिला प्रशासन ने युवाओं विद्यार्थियों को संघ लोक सेवा आयोग यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा को लेकर मार्गदर्शन और काउंसिलिंग के लिए समर्थन कार्यक्रम आरंभ किया है। यह यूपीएससी आकांक्षियों के लिए एक निःशुल्क कार्यक्रम है, जिसमें शिक्षा उत्थान समिति मंडी के सहयोग से वल्लभ राजकीय महाविद्यालय मंडी में विद्यार्थियों के लिए पहला मार्गदर्शन और काउंसिलिंग सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। यह प्रयास शुरू करने वाले डीसी मंडी ऋगदेव ठाकुर बताते हैं कि युवाओं-विद्यार्थियों को संघ लोक सेवा आयोग यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के हर पहलू से अवगत करवाया जा रहा है। जिला में काम कर रहे आईएएस, आईपीएस और अन्य अधिकारी परीक्षा को लेकर युवाओं-विद्यार्थियों का मार्गदर्शन और काउंसलिंग कर रहे हैं। वे उनके साथ विषय चयन, सिलेबस तैयारी की रणनीति पर बात करने और जरूरी टिप्स देने के अलावा अपने अनुभव साझा करते हुए उन्हें एक तरह से कोचिंग दे रहे हैं। हर महीने के तीसरे बुधवार को दो घंटे का काउंसिलिंग सत्र आयोजित किया जाता है।

युवाओं के मार्गदर्शन के लिए जिला प्रशासन का बड़ा प्रयास

अतिरिक्त उपायुक्त जतिन लाल बताते हैं कि कई बार युवाओं को यूपीएससी परीक्षा को लेकर कई चीजों की जानकारी ही नहीं होती, जिसके चलते उन्हें अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। परीक्षा के विषयों से लेकर किताबों तक के बारे में सही जानकारी के अभाव में यहां-वहां भटकना पड़ता है। हमारा प्रयास है कि समर्थन कार्यक्रम के जरिए परीक्षा पास करने से जुड़े हर पहलू को लेकर युवाओं का मार्गदर्शन किया जाए। उनकी समस्याएं सुनकर समाधान किया जाए। उनके वित्तीय दिक्कतों से लेकर मानसिक परेशानियों तक में मदद की जाए।

हमीरपुर-शिमला चंडीगढ़-कोटा को भी लग रही दौड़

मंडी जिला से हर वर्ष सैकड़ों बच्चे कोचिंग के लिए जिला के बाहर का रुख कर रहे हैं। यहां से हमीरपुर, शिमला, चंडीगढ़ और कोटा तक के कोचिंग सेंटर अभिभावकों व बच्चों की पसंद हैं। लाखों रुपए खर्च कर बच्चे जिला के बाहर जाकर नीट व जेईई की कोचिंग ले रहे हैं। वहीं, घर बैठकर भी प्रदेश के बाहर व अन्य जिलों के कोचिंग सेंटर से बच्चे ऑनलाइन स्टडी भी कर रहे हैं।

छोटी काशी के गुरुओं ने कर दिया कमाल

इस समय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अभिभावक लाखों रुपए खर्च रहे हैं। मंडी जिला से हर वर्ष सैकड़ों बच्चे बाहर जाकर यह शिक्षा ले रहे हैं, लेकिन सरकाघाट उपमंडल के कुछ ऐसे अध्यापक भी हैं, जो छुट्टी के बाद बच्चों के कोच बन गए और स्कूल में निःशुल्क कोचिंग देकर बेहतर परिणाम दे डाले। इस अनोखी पहल की शुरुआत कुछ वर्ष पहले राजकीय आदर्श विद्यालय सरकाघाट से हुई थी। यहां स्कूल की छुट्टी के बाद कुछ अध्यापकों ने बच्चों को पांच बजे तक पढ़ाना और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का बीड़ा उठाया। यहां साइंस के प्राध्यापक सचिन ठाकुर ने कुछ अन्य प्राध्यापकों को साथ लेकर कोचिंग देना शुरू किया। इन अध्यापकों ने इस दौरान कोई छुट्टी भी स्कूल से नहीं ली, जिसका नतीजा यह हुआ कि क्षेत्र से पांच साल में 21 नीट, 100 के लगभग जेईई, सैकड़ों वेटरिनरी साइंस, हॉर्टिकल्चर, एग्रीकल्चर, बीएससी नर्सिंग और एनडीए प्रतियोगी परीक्षाओं में छात्र-छात्राएं सफल हो गए, जिनकी कोचिंग व नींव इसी विद्यालय से हुई थी। इसी अतिरिक्त प्रयास से राजकीय आदर्श विद्यालय सरकाघाट की विज्ञान संख्या की छात्र संख्या कभी 300 से नीचे नहीं आई, जबकि कई सरकारी स्कूल के विद्यालय अपनी घटती छात्र संख्या से परेशान हैं।

टारगेट था… छात्रों ने सॉल्व किए आठ हजार न्यूमेरिकल

अध्यापक सचिन बताते हैं कि इस दौरान बच्चों के भौतिक विज्ञान खासकर न्यूमेरिकल सॉल्विंग पर काम किया गया। कोशिश होती थी कि जमा एक व दो के बच्चे विद्यालय में ही कम से कम दो वर्षों में आठ हजार न्यूमेरिकल सॉल्व करें। इस तरह कवर किए गए सिलेबस के मॉक टेस्ट लिए जाते थे और दो महीने में एक रविवार को प्रतियोगी परीक्षाओं की छाया परीक्षा करवाई जाती थी। इसमें चंडीगढ़ के कोचिंग संस्थान ने भी सहायता की। गणित में अश्वनी पटियाल, बायोलॉजी में संजय कुमार, रसायन विज्ञान में अनुपम शर्मा का साथ मिला और राकेश टपवाल और अश्वनी शर्मा सरीखे धाकड़ और दूरदर्शी शिक्षाविद प्रिंसिपल का मार्गदर्शन रहा। अभिभावकों का संपूर्ण सहयोग मिला और बच्चों ने खूब मेहनत की।

सरकार चाहे, तो स्कूल में दी जा सकती है अच्छी कोचिंग

बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए मंडी जिला में कोचिंग सेंटर की पर्याप्त सुविधा नहीं है, लेकिन अध्यापक व सरकार चाहे, तो स्कूलों में ही कोचिंग दी जा सकती है। बशर्ते विद्यालय के पास डेडिकेटिड विज्ञान प्राध्यापकों की टीम हो। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी हेतु कुछ विद्यालय चिन्हित किए जाएं और वहां डेडिकेटिड शिक्षकों को कम से कम पांच वर्ष का कार्यकाल दिया जाए, तो उत्कृष्ट परिणाम निकाले जा सकते हैं। ज्यादा बेहतर हो कि वहां छात्रों और शिक्षकों के लिए आवासीय सुविधा हो। अब लॉकडाउन व कई अध्यापकों के स्थानातंरित होने से यह पहल कुछ देर के लिए थम चुकी है।

मंडी के कोचिंग सेंटर

 एजुकेशन प्वाइंट मंडी

 एसआर विद्या मंदिर

 श्री चैतन्या मंडी  संकल्प क्लासेज  मांइड ऑपरेशन जोगिदं्रनगर, पद्धर

 स्वास्तिक मंडी  मांडव्य टयूशन वर्ड  फ्य़ूचर पाथ

 सूद मिशन क्लासेज

 कांसेप्ट सुंदरनगर  फेजर सुंदरनगर  मॉडर्न कोचिंग सेंटर पड्डल  ट्यूटन मंडी  ज्ञान कुंज नेरचौक

 राइजिंग स्टार अकादमी

 निखिल अकादमी नेरचौक

सचदेवा मंडी  दीप अकादमी जोगिंद्रनगर  ज्ञानम अकादमी सुंदरनगर

 हरिहर अकादमी नेरचौक

 डिफेंस एंड कोचिंग अकादमी सरकाघाट