चंबियाली लोक साहित्य में चबोला परंपरा

By: Apr 25th, 2021 12:05 am

विमर्श के  बिंदु

अतिथि संपादक : डा. गौतम शर्मा व्यथित

हिमाचली लोक साहित्य एवं सांस्कृतिक विवेचन -29

-लोक साहित्य की हिमाचली परंपरा

-साहित्य से दूर होता हिमाचली लोक

-हिमाचली लोक साहित्य का स्वरूप

-हिमाचली बोलियों के बंद दरवाजे

-हिमाचली बोलियों में साहित्यिक उर्वरता

-हिमाचली बोलियों में सामाजिक-सांस्कृतिक नेतृत्व

-सांस्कृतिक विरासत के लेखकीय सरोकार

-हिमाचली इतिहास से लोक परंपराओं का ताल्लुक

-लोक कलाओं का ऐतिहासिक परिदृश्य

-हिमाचल के जनपदीय साहित्य का अवलोकन

-लोक गायन में प्रतिबिंबित साहित्य

-हिमाचली लोक साहित्य का विधा होना

-लोक साहित्य में शोध व नए प्रयोग

-लोक परंपराओं के सेतु पर हिमाचली भाषा का आंदोलन

चंचल सरोलवी मो.-8580758925

लोकसाहित्य की दृष्टि से हिमाचल कितना संपन्न है, यह हमारी इस शृंखला का विषय है। यह शृांखला हिमाचली लोकसाहित्य के विविध आयामों से परिचित करवाती है। प्रस्तुत है इसकी 29वीं किस्त…

चंबा लोकसाहित्य की अनेक विधाओं में लोक पद्य चबोला परंपरा भी एक है। हालांकि लोकसाहित्य की कुछ विधाएं दुर्लभ और विलुप्त होती जा रही हैं। इन्हीं में से एक है लोक पद्य चबोला परंपरा। चबोला यानी कि चार बोल। अपने मन का भेद बताने के लिए और दूसरे के मन का भेद जानने के लिए   पद्यात्मक रूप से (शायरी की भांति) इसका प्रयोग करके जवाब लिया और दिया जाता है। अर्थात असली बात को बीच में छिपाकर  बहाने से जवाब लेना-देना होता है। पर मजा तो वही लूट सकता है, जो बीच की बात को जानता हो।

चबोला को सुग्गली भी कहते हैं। चबोला या सुग्गली अपने सुगल अर्थात मौज़-मस्ती से मन को बहलाने के लिए हंसी-मजाक करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है, जो हंसा-हंसा कर जहां लोट-पोट कर देता है, वहीं ज्ञानवर्धक भी है। चबोला का प्रयोग जब लोकगीतों में  किया जाता है, तो इसे सुग्गली या ‘दोहोडे’ कहते हैं। इस प्रकार चंबयाल़ी लोकसाहित्य का चबोला अनेकता के रंगों से रंगा हुआ है। कोई भी इसका प्रयोग अपनी बातचीत में  कर सकता है, परंतु असली बात से अनभिज्ञ होने पर दाल में कुछ काला-काला सा नजर आता है। अतः इसका प्रयोग अपने मन का भेद बताने के लिए और दूसरे के मन का भेद जानने के लिए किया जाता है। यह परंपरा लगभग विलुप्त होने की कगार पर है। चबोला का प्रयोग कैसे किया जाता है, इसका उदाहरण देकर पाठकों की नजर इसकी बानगी हाजिर कर रहा हूं। एक आदमी का चेहरा बहुत ही काला था। उससे कोई भी लड़की शादी करने के लिए तैयार नहीं होती थी। परंतु कहते हैं कि परमात्मा के घर देर है, अंधेर नहीं। उसे बहुत ही सुंदर खूबसूरत पत्नी मिली। परंतु वह उससे दूर रहता और हाथ तक न लगाता, यह सोचकर कि मैं काला हूं, हो सकता है यह भी काली हो जाए। इसलिए वह दूर रहता। उधर पत्नी भी मन ही मन दुखी थी। गर्मियों के दिन थे।

वह काला आदमी किसी काम के लिए चंबा शहर आया हुआ था। वहां चम्बे दा बूट्टा नामक सफेद फूल के पेड़ के नीचे आराम करने बैठ गया। इतने में क्या देखते है कि एक काला भौंरा उड़ता हुआ आया और उस सफेद फूल पर बैठकर उसका रस चूसने लगा। काफी समय तक उस पर बैठा, रस चूसता रहा और फिर उड़कर चला गया। यह प्रक्रिया उसने तीन-चार बार की। उस आदमी को वहां से ज्ञान की प्राप्ति हुई और फिर चबोला बोलता है ः ‘चम्बे देया बूट्टेया, तु नागर वेली छायां। जुग जुग जियां कालेया भौंरा, तैं मूर्ख पैन्डे पाया।’ अर्थात ज्ञान अर्जित होने के उपरांत वह चंबा के वृक्ष को सदा हरा-भरा रहने का आशीर्वाद देता है। वहीं उस काले भौंरे को युगों-युगों तक जीवित रहने का आशीर्वाद देता है। हुआ न ज्ञानवर्धक चबोला? ऐसे ही एक नई नवेली दुल्हन घास काटने घारी नामक जंगल में जा रही थी। रास्ता एक खेत से होकर जाता था। उस खेत में एक युवक किसान हल जोतकर आलू बीज रहा था। तो उन दोनों की आंखें चार हुईं और वे दोनों एक-दूसरे को देख कर हंस पड़े यानी मुस्कुरा दिए, परंतु बात नहीं की। युवक ने सोचा कि हंसी तो फंसी। यह सिलसिला तीन-चार दिन चलता रहा। युवक ने मन बना लिया कि इससे बात जरूर करूंगा। अगले दिन जब दुल्हन घर से निकलने लगी तो किसी बात को लेकर पति से झगड़ा हो गया। वह गुस्से से लाल-पीली हो गई और बिना कुछ खाए-पिए घास काटने के लिए निकल पड़ी।

उस युवक ने उसे दूर से ही आते देख लिया। वह मन ही मन बहुत खुश हुआ कि आज तो वह उससे जरूर बात करेगा, परंतु जब वह उसके निकट पहुंची तो उसने अपना चेहरा और ज्यादा रूखा कर लिया तथा नजरें झुका लीं। जब वह उसके पास से गुजर रही थी तो उसने चबोला बोला: ‘घा बड्डदी, घाणी, घा बड्डे घारी। सोए सल़ोके पुच्छदा, अज तेरी गल कियां भारी।’ अर्थात युवक ने उस दुल्हन से कहा कि हे घास काटने वाली घसियारी घास काटने जा रही हो घारी (जंगल का नाम)। श्लोक के बहाने मैं तुमसे पूछता हूं कि आज तेरी बात क्यों है भारी? अर्थात तुम नाराज सी क्यों लगती हो? वह क्योंकि पहले ही अपने पति से झगड़ा करके आई थी और इस चबोले ने भी आग में घी डालने का काम कर दिया। इसलिए बहुत नाराज होकर वह उसे चबोले में ही जवाब देती है: ‘हल़ बान्धा हल़बाईया, हल़े बाए तैं आलु। गल कुगल मत बोलदा, निता मेरी चप्पली तेरा तालु।’ अर्थात हे हल चलाने वाले, हल चलाकर बीज रहे हो तुम आलू। ऐसी वैसी बात मत कहना वरना अपने पांव की चप्पल से मार-मार कर तेरा सिर कर दूंगी गंजा। वह कह कर चल दी और युवक चुपचाप खड़ा उसे निहारता रहा। सास और बहू का झगड़ा तो जगजाहिर है। एक बहू अपनी सास को नीचा दिखाने के लिए सिरदर्द का बहाना बनाती है। उसके पति ने बहुत इलाज करवाया, परंतु उसके सिर की दर्द टस से मस न हुई। एक रात उसने अपने पति से कहा कि आज दिन को एक चेला (गुर) आया था, उसने एक टोना बताया है कि अगर तुम्हारी मां अपने बाल कटवा कर, मुंह काला कर, गले में गोटू (उपले) की माला पहन कर, गधे पर सवार होकर मेरे सामने सात चक्कर लगाए तो मेरा सिर दर्द दूर हो सकता है। पति ने कहा ठीक है, यह भी करके देख लेते हैं।

सुबह पति अपनी सास के पास गया। उसे सारा वृत्तांत सुनाया और वह ऐसा करने को राजी हो गई। उसने अपनी सास के बाल काट कर, उसका मुंह काला कर, उसके गले में उपलों की माला पहनाकर और गधे पर सवार कर, अपने घर ले आया और अपनी पत्नी के सामने बाएं-दाएं सात बार घुमाया। पत्नी बहुत खुश हुई और उसने अपने पति से  चबोला बोल कर बात की ः ‘दिक्खे स्त्री चाल़े, सर मुन्ने ते मुंह काल़े।’ अर्थात, देखी स्त्री की चाल? सिर के बाल कटवा कर मुंह भी करवा दिया है काला। उसका पति भी हंसते हुए चबोले में ही जवाब देता है :  ‘दिक्खी मडदे दी फेरी, मां मेरी की मुइए तेरी।’ अर्थात…देखी पुरुष की चाल? मुंह साफ  करके देख, मां मेरी है कि तेरी? अपनी मां को देख कर वह बहुत दुखी हुई। इसी तरह कई अन्य चबोले भी हैं। चंबा लोकसाहित्य का लोक पद्य चबोला परंपरा अनगिनत रंगों में रंगा हुआ है। इसके संरक्षण की अत्यंत जरूरत है ताकि आने वाली पीढ़ी भी अनभिज्ञ न रहे।