सोलन नगर निगम यह जरूरत थी

By: Mar 10th, 2021 12:06 am

प्रदेश की राजधानी शिमला के बाद सबसे तेजी से विकसित होने वाला सोलन शहर पिछले करीब डेढ़ दशक से नगर निगम बनाए जाने की आस संजोए बैठा था। प्रदेश में सरकारें आती और जाती रहीं, लेकिन सोलन को नगर निगम का दर्जा नहीं मिल पाया, जिसका खामियाजा यहां की आम जनता को भुगतना पड़ा। लोगों ने संघर्ष भी किया, कई आंदोलन व प्रदर्शन भी हुए, लेकिन यह मुहिम सिरे नहीं चढ़ पाई। खैर अब सोलन शहर को नगर निगम का दर्जा मिल ही गया है, तो आगे बढ़ने के लिए कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ेगा। नए बने नगर निगम सोलन के नुमाइंदों के लिए क्या हैं चुनौतियां और संभावनाएं…

दखल में बता रहे हैं संवाददाता सौरभ शर्मा

सोलन नगर परिषद को नगर निगम बनाए जाने को लेकर कई ऐसे मुद्दे हैं, जिस कारण सरकार ने इस ओर रुचि दिखाई है। सोलन प्रदेश का नहीं, बल्कि उत्तरी भारत का सबसे तेजी से विकसित हो रहा शहर है। सोलन को एजुकेशन हब के नाम से जाना जाता है और इसके आसपास कई नामी विश्वविद्यालय व कालेज स्थापित हैं। परवाणू से शिमला तक फोरलेन का कार्य चल रहा है, जो कि सोलन से होकर ही जाएगा।

चंडीगढ़ से कम दूरी और रेलमार्ग का होना भी सोलन के पक्ष में रहा है। इसके अलावा सोलन को औद्योगिक क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है। इन सभी बातों के चलते सोलन को नगर निगम बनाए जाने की योजना सिरे चढ़ पाई है। जनसंख्या की बात करें, तो प्रदेश सरकार पहले ही नगर निगम के लिए 40 हजार की जनसंख्या का मापदंड तय कर चुकी है, जिसे सोलन लगभग पूरा करता है और आसपास की पंचायतों के सेमीअर्बन एरिया को शामिल करन के बाद आबादी कहीं अधिक हो जाएगी।

अभी भी विरोध में ग्रामीण

नगर निगम बनाए जाने को लेकर सोलन की आठ पंचायतों के क्षेत्रों को शामिल करने की अटकलों के बाद ग्रामीणों ने इसका विरोध जताना शुरू कर दिया था। जिला मुख्यालय में इसे लेकर प्रदर्शन भी किए गए थे। नगर निगम पर मुहर लग चुकी है और पंचायतों के किन-किन क्षेत्रों को शामिल किया जाएगा, इसकी तस्वीर भी साफ हो चुकी है, लेकिन ग्रामीण अभी भी इसका विरोध जता रहे हैं।

जनता के सहयोग से रंग लाया दशकों का संघर्ष

वर्ष 2014 में तत्कालीन नगर परिषद अध्यक्ष राकेश पंत की अध्यक्षता में हाउस ने सोलन को नगर निगम का दर्जा दिए जाने का प्रस्ताव पारित कर सरकार को भेजा था। हालांकि लगभग हर तय मापदंडों को पूरा करने के बाद भी तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2016 में सोलन की बजाय धर्मशाला को तरजीह दी और उसे नगर निगम का दर्जा दे दिया। नगर निगम की मांग की प्रमुखता को देखते हुए जुलाई, 2017 में शहरवासियों ने नगर निगम संघर्ष समिति का गठन किया था। इसमें लगभग सभी पार्टियों के नुमाइंदे शामिल थे, हालांकि वे सभी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सोलन को नगर निगम बनाए जाने के लिए प्रयासरत रहे। समिति की ओर से पिछले तीन वर्षों से लगातार अपने स्तर पर व शहरवासियों के साथ मिलकर कई अनोखे प्रयास किए गए।

 इनमें सर्वप्रथम करीब आठ हजार लोगों के हस्ताक्षर करवाना, वहीं समय-समय पर मुख्यमंत्री व अन्य मंत्रियों से मिलना शामिल हैं। इसके अलावा करीब 750 स्टिकर बनाकर नगर निगम बनाए जाने की मांग करना और शहरवासियों की ओर से मुख्यमंत्री को करीब 450 पोस्टकार्ड भिजवाना भी शामिल है। वर्ष 2020 में अगस्त माह में वर्तमान सरकार द्वारा सोलन सहित अन्य नगर परिषदों को निगम का दर्जा दिए जाने को लेकर कवायद शुरू की गई। इस कार्य में जनसंख्या का आंकड़ा बाधा न बने, तो उसे देखते हुए सरकार ने नगर निगम के लिए 50 हजार की आबादी की शर्त को भी कम करके 40 हजार कर दिया, जिसके बाद सोलन, पालमपुर व मंडी को नगर निगम का दर्जा दे दिया गया। नगर निगम संघर्ष समिति के संयोजक कुल राकेश पंत ने कहा कि पिछले लगभग तीन वर्षों से सोलन को नगर निगम का दर्जा दिलाए जाने के लिए प्रयासरत रहे हैं। सोलन की जनता के सहयोग से यह संघर्ष रंग लाया है।

पहले चुनाव में बनाए तीन विधानसभा क्षेत्र

1952 में हुए प्रथम चुनाव में इस भौगोलिक क्षेत्र से तीन विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र बनाए गए थे। सोलन विधानसभा क्षेत्र हिमाचल प्रदेश के अंतर्गत था, जबकि शिमला, पंजाब और नालागढ़ पेप्सू के अंतर्गत आता था। इस चुनाव में हिमाचल प्रदेश विधानसभा के लिए सोलन से हीरा सिंह पाल और राम दास दो विधायक निर्वाचित हुए थे। उस समय सोलन और अर्की तहसीलें एक विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आती थी। पंजाब विधानसभा के लिए शिमला से एडवोकेट सोमदत्त और पेप्सू विधानसभा के लिए नालागढ़ विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से राजा सुरेंद्र सिंह विधायक निर्वाचित हुए।

 दूसरी बार हुए चुनाव में पेप्सू का पंजाब में विलय हो चुका था। इसलिए 1957 में हुए विधानसभा चुनाव के लिए नालागढ़ विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से दसौंधी राम विधायक निर्वाचित हुए। सोलन से केंद्रीय परिषद के लिए नगीन चंद्र पाल और केशव राम का निर्वाचन हुआ। पंजाब विधानसभा के लिए शिमला से मनी लाल को चुना गया। 1962-63 के चुनाव के लिए अर्की और सोलन अलग-अलग चुनाव क्षेत्र बनाए गए। इस चुनाव में हिमाचल प्रदेश विधानसभा के लिए अर्की से हरि दास सोलन से केशव राम और दून विधानसभा से लेखराम ठाकुर को चुना गया। पंजाब विधानसभा के लिए शिमला से ज्ञान चंद टुटू, नालागढ़ से दसौंधी राम और अर्जुन सिंह और कंडाघाट से भगवान सिंह निर्वाचित हुए। 1967 के चुनाव में अर्की से हीरा सिंह पाल, दून से लेखराम, कंडाघाट से नेकराम, नालागढ़ से अर्जुन सिंह और सोलन से केशव राम विधायक निर्वाचित हुए। पहली सितंबर, 1972 को जिलों का पुनर्गठन किया गया और शिमला विधानसभा क्षेत्र को नवगठित शिमला जिला में मिलाया गया।

शूलिनी देवी के नाम का अपभ्रंश है सोलन

सोलन शब्द शूलिनी देवी के नाम का अपभ्रंश है। शूलिनी बघाट राजघराने की कुलदेवी थी। बघाट नरेश ने जिस स्थान पर माता शूलिनी के मंदिर की स्थापना की, वह स्थान शूलिनी से बदलकर कालांतर में सोलन हो गया। बघाट रियासत के हिमाचल प्रदेश में विलय तक सोलन इसकी राजधानी रही। इसके बाद बघाट को हिमाचल प्रदेश के महासू जिला का भाग बनाकर रियासत का अस्तित्व समाप्त हो गया। हिमाचल प्रदेश के गठन के बाद प्रदेश के विभिन्न भागों से जिलों के पुनर्गठन की मांग उठने लगी। प्रशासकीय तौर पर भी यह महसूस किया जाने लगा था। परिणामस्वरूप 29 अगस्त, 1972 को जिलों के पुनर्गठन को मंत्रिमंडल ने अनुमोदित कर दिया। इसके बारे में दो सितंबर, 1972 को शिमला में रिज पर आयोजित एक भारी जनसमूह को संबोधित करते हुए हिमालच प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. यशवंत सिंह परमार ने कहा कि हिमाचल में जिलों का पुनर्गठन देशभर में एक अनुपमेय उदाहरण प्रस्तुत करता है, यद्यपि कई अन्य राज्यों में भी नए जिलों का निर्माण हुआ है। हिमाचल में जिलों का यह परिमेयकरण न केवल जनसाधारण को और अधिक सुविधाएं जुटाने अथवा उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने में सफल हुआ है, अपितु यह ब्रिटिश साम्राज्य की बपौती के अंत का संकेत भी है, जो जनता का दमन करने वाले सामंतों की पीठ थपथपाते थे और उन्हें छोटी-छोटी रियासतों में बांटा करते थे। डा. यशवंत सिंह परमार ने कहा कि शिमला और महासू के लोग हमेशा से अपने आप को एक समझते आए हैं, यद्यपि भिन्न प्रशासन व्यवस्थाओं के अंतर्गत इन्हें रहना पड़ा। परमार ने कहा कि जिलों का आकार छोटा होना चाहिए, ताकि दूरपार के इलाकों में रहने वाले लोगों की तरफ भी ध्यान दिया जा सके।

 हिमाचल में इससे पूर्व सभी आकार के जिले होने के कारण यह अनुभव हो गया कि छोटे जिले बड़े जिले की अपेक्षा जल्दी से प्रगति करते हैं। इसी जनसभा में डा. यशवंत सिंह परमार ने शिमला और सोलन जिलों के सीमांकन के संदर्भ में कहा कि पहाड़ों के इन हिस्सों में रहने वाले छह लाख लोग एक जिला बने रहने की बात पर भी राजी थे, यदि महज ऊना को ही एक जिला बनाने की बात की जाती। हमीरपुर के लोग ऊना से मिलने पर राजी नहीं थे और उन्हें धर्मशाला जाने की असुविधा से बचाने के लिए एक अलग जिला बनाना पड़ा। अब क्योंकि हिमाचल एक पूर्ण राज्य है, इसलिए सरकार ने दो नए जिले बनाने का निश्चय किया। महासू के लोग अपने जिले का नाम बदलने और शिमला का नाम अपनाने के लिए राजी होने पर विशेष रूप से धन्यवाद के पात्र हैं। इस स्थिति में नए जिलों को 50 लाख रुपए प्राप्त होंगे, जिससे लाखों लोग लाभान्वित होंगे। जिलों का पुनर्गठन करते हुए प्रदेश सरकार ने महासू के निचले क्षेत्र तथा पंजाब से हिमाचल प्रदेश में मिले नालागढ़ व कंडाघाट तथा कसौली क्षेत्रों को मिलाकर सोलन जिला का गठन किया।  (साभार; सोलन जनपदः ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य, नेमचंद ठाकुर)

1972 में बना जिला सोलन

सितंबर, 1972 को सोलन जनपद हिमाचल प्रदेश के मानचित्र पर एक जिले के रूप में उभरकर सामने आया, जिसका मुख्यालय सोलन रखा गया। दूसरा जिला हमीरपुर बनाया गया। इस जिले में कांगड़ा की हमीरपुर और बड़सर तहसीलों को शामिल किया गया। इस तरह हिमाचल प्रदेश के मानचित्र पर दो नए जिले सोलन और हमीरपुर उभरकर सामने आए।

50 के दशक में बनी थी नगर पालिका

सोलन को 50 के दशक में नगरपालिका का दर्जा दे दिया गया था। उस समय नगरपालिका में पांच वार्ड होते थे, जो कुछ वर्षों बाद बढ़ाकर सात किए गए और उसके बाद सन् 1975 में नगरपालिका में नौ वार्ड कर दिए गए। शुरुआत में पालिका में चुने गए वार्ड सदस्यों की बजाय मोहन मीकिन ब्रूरी के संस्थापकों को अध्यक्ष की कमान दी जाती थी। वर्ष 1975 में जब नगरपालिका में नौ वार्ड किए गए, उसके बाद सरकार की ओर से यहां एक प्रशासक की नियुक्ति कर दी गई और करीब दो दशक वार्ड सदस्यों के चुनाव नहीं करवाए गए। सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासक ही नगरपालिका के सभी कार्यों को देखता था। वर्ष 1995 में सोलन को नगर परिषद का दर्जा दिया गया और शहर के साथ लगते कुछ क्षेत्रों को मिलाकर 13 वार्ड बनाए गए। करीब 20 साल बाद चुनाव करवाए गए और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डा. राजीव बिंदल नगर परिषद सोलन के पहले अध्यक्ष बने। वर्ष 2015 में एक बार फिर नगर परिषद का पुनर्सीमांकन कर दो नए वार्ड बनाए गए और कुल वार्ड 15 हो गए।

2014 में उठी नगर निगम की मांग

नगर परिषद सोलन को नगर निगम का दर्जा दिए जाने की मांग वर्ष 2014 में उठी और करीब छह वर्षों के कड़े संघर्ष के बाद अक्तूबर, 2020 में सोलन को मंडी व पालमपुर के साथ नगर निगम का दर्जा दे दिया गया। नगर निगम को लेकर प्रशासकीय तौर पर कई कार्य किए गए और इसमें सबसे प्रमुख पुनर्सीमांकन कर आसपास की आठ पंचायतों के कुछ क्षेत्रों को नगर निगम में मिलाया जाना भी था। इस कार्य को संपन्न कर अब नई नगर निगम में कुल 17 वार्ड बनाए गए हैं।

पहले रहती थी बजट की कमी

सोलन शहर का विकास पहले की अपेक्षा अधिक तेजी से होगा। इसके पीछे प्रमुख कारण यह है कि जब सोलन नगर परिषद थी, तो उसके पास विकास के लिए बजट की कमी रहती थी, जिसके चलते नगर का विकास उस ढंग से नहीं हो पा रहा था, जिस ढंग से समय की मांग थी। अब सब यह सहज संभव होगा —जसवंत बहल

विकास का नया इतिहास रचने जैसा

सोलन को नगरपालिका को नगर परिषद से नगर निगम का दर्जा देना विकास का नया इतिहास रचने जैसा है। ऐसा होने पर अब सोलन शहर के विकास का नया इतिहास लेखन आरंभ हो रहा है। विकास के जो अध्याय लिखे नहीं जा रहे थे, अब वे लिखे जाएंगे। विकास को लेकर अब सोलन का रूप स्वरूप और भी बहुत कुछ बदलने वाला है

—नेमचंद ठाकुर

सोलन का भविष्य उज्ज्वल है….

देरी से लिया हुआ सही कदम

सोलन नगर निगम बन गया, जो कि देर से लिया हुआ सही कदम है। आसपास के गांव कंकरीट के जंगल में बेतरतीब बस चुके हैं। सुविधाओं के अभाव में गुजर-बसर कठिन है। आशा की लो दिख रही है, पर निर्भर करता है कि चयनित पार्षदों पर वह कितनी दूरदर्शिता, निष्पक्षता व क्षमता से काम करेंगे। निर्णय तो उज्ज्वल भविष्य का प्रथम पड़ाव है

डा. शंकर वाशिष्ठ, शिक्षाविद्, सोलन

अब लगेंगे सोलन को नए पंख

सरकार ने सोलन को नगर परिषद से नगर निगम के दर्जे से नवाजा है, तो तय है अब सोलन के विकास को पंख लगेंगे। जिन विकास के कार्यों को चाहकर भी नगर पालिका करने में असमर्थ थी, वे तेजी पकड़ेंगे। अब पहले जो विकास की गति धीमी रहती थी, वह तेज हो जाएगी, जिससे सोलन शहर के नागरिकों को सुविधाएं और

बेहतर मिलेंगी देवेश गौतम

बड़ी चुनौतियां हैं इस राह में…

सोलन शहर में बढ़ती आबादी के चलते नगर परिषद लोगों को मूलभूत सुविधाएं प्रदान करने के लिए निरंतर प्रयासरत रही है, लेकिन फिर भी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जहां अभी भी बहुत कार्य किया जाना बाकी है। यही क्षेत्र नगर निगम बनने के बाद भी प्रमुख चुनौतियों के रूप में खड़े रहेंगे। इनमें सबसे प्रमुख है शहर की पेयजल व सीवरेज व्यवस्था। शहर में पेयजल वितरण का जिम्मा तो नगर परिषद संभालती है, लेकिन उसे पानी के लिए जल शक्ति विभाग पर निर्भर रहना पड़ता है। चाहे कोई भी मौसम हो, शहरवासियों को पेयजल की दिक्कत से दो-चार होना ही पड़ता है। यही हाल सीवरेज व्यवस्था का भी है। शहर के वार्डों की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए अभी तक सीवरेज व्यवस्था भी अधिकांश क्षेत्रों में अधर में ही है। कूड़ा निष्पादन भी सबसे बड़ी समस्या है। शहर में प्रतिदिन 20 टन से अधिक कचरा निकलता है, जिसके निष्पादन को लेकर कूड़ा संयंत्र की दरकार है। नगर परिषद ने पिछले वर्ष ही इसे लेकर गुजरात की एक कंपनी से बात की थी, लेकिन अभी तक उस पर कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं हो पाई है। इसके अलावा शहर में आबादी बढ़ने के साथ-साथ गाडि़यों की संख्या में भी लगातार वृद्धि हो रही है। आए दिन लोग शहर की प्रमुख सड़कों पर जाम लगा रहता है और लोग काफी-काफी समय तक लंबी-लंबी कतारों में फंसे रहते हैं। नगर निगम बनने के बाद इस ट्रैफिक व्यवस्था को सुधारने के लिए बाइपास मार्गों का निर्माण समय की मांग रहेगा और इसके साथ ही पार्किंग व्यवस्था को सुदृढ़ करना भी चुनौती रहेगा।

25 हजार से ज्यादा गाडि़यां पार्किंग सिर्फ 500 के लिए..

शहर में 25 हजार से अधिक वाहन हैं, जबकि पार्किंग 500 गाडि़यों की भी नहीं है। जिला मुख्यालय होने के कारण बाहरी क्षेत्रों से भी लोग अपने कार्यों के लिए यहां पहुंचते हैं, जिस कारण मजबूरन वाहन चालकों को अपनी गाडि़यों को सड़क किनारे पार्क करना पड़ता है। पार्किंग निर्माण के लिए नगर परिषद ने कई प्रस्ताव रखे, लेकिन कभी फंड की कमी, तो कभी अन्य कारणों के चलते प्रस्ताव सिरे नहीं चढ़ पाए। नगर निगम बन जाने के बाद अब इन सभी चुनौतियों से पार पाना चुने गए प्रतिनिधियों के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।

नगर निगम में भी बनना होगा नंबर-1

देवेंद्र ठाकुर, अध्यक्ष नगर परिषद, सोलन

प्रश्नः नगर परिषद से नगर निगम के बीच कौन सी नई मंजिलें तय करनी होंगी?

उत्तरः सोलन नगर परिषद प्रदेश की सबसे बड़ी परिषद थी। आधिकारिक आंकड़ों की बात न करें, तो शहर की जनसंख्या करीब एक लाख तक पहुंच गई है। इसके अलावा अस्थायी तौर पर भी लोगों का आना-जाना लगा रहता है। इतनी जनसंख्या को मूलभूत सुविधाएं प्रदान करना परिषद के लिए कठिन होता जा रहा था। ऐसे में परिषद को नगर निगम का दर्जा दिया जाना अत्यंत आवश्यक था। निगम बनने पर बजट में वृद्धि होगी, जिससे कई तरह की कठिनाइयों को पार पाने में सहायता मिलेगी। निगम बनने के बाद सोलन को एक बार फिर से प्रदेश में नंबर वन बनने की ओर अग्रसर होना होगा।

प्रश्नः किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा?

उत्तरः चुनौतियां बहुत सी हैं। कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां काफी कार्य किए जाना बाकी हैं, इनमें सीवरेज, पार्किंग सहित आम जनता से जुड़ी कई समस्याएं हैं। नगर निगम बनने के बाद इन चुनौतियों को दूर करना प्राथमिकता में होगा। इसके अलावा कर्मचारियों की कमी भी एक बहुत बड़ी चुनौती है। नए पद सृजित होंगे और रिक्त पड़े पद भी जल्द भरने होंगे। निगम बनने से क्षेत्रफल में बढ़ोतरी हुई है, नई योजनाएं भी आएंगी, कार्यभार बढ़ेगा। इन सभी से पार पाने के लिए कर्मचारियों की नियुक्तियां करनी होंगी और उनके लिए कार्यालय की भी व्यवस्था करनी होगी।

नगर परिषद किन-किन बातों और जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही थी?

उत्तरः नगर निगम की अपेक्षा नगर परिषद का सालाना बजट कम होता है और केंद्र की कई ऐसी योजनाएं हैं, जिनका लाभ केवल निगम को ही मिल पाता है। सोलन तेजी से बढ़ता हुआ शहर है और मूलभूत सुविधाओं को पूरा कर पाना काफी मुश्किल था। हालांकि नगर परिषद सोलन ने अपने दम पर आय अर्जित करने के स्रोत बनाए हुए हैं, जिससे बजट की कमी को आड़े नहीं आने दिया जाता था। इसके बावजूद केंद्रीय योजनाओं की कमी, डोर-टू-डोर गारबेज कलेक्शन का बजट, पार्किंग की समस्या, रेहड़ी धारकों के लिए वेंडर मार्केट सहित कई ऐसे पहलू हैं, जिन्हें पूरा करने में कठिनाई आ रही थी। आशा है कि नगर निगम बनने के बाद ये कमियां दूर की जा सकेंगी।

प्रश्नः नगर निगम बनने तक विकास कार्यों की स्थिति क्या है?

उत्तरः जब से सोलन को नगर निगम घोषित किया गया है, तब से विकास कार्यों की रफ्तार मंद पड़ी है। इसका मुख्य कारण यह है कि निगम बनते ही आयुक्त की नियुक्ति कर दी गई। नगर परिषद पार्षद भी नगर निगम के पार्षद बन गए, लेकिन अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के पदों में कोई संशोधन नहीं किया गया। पहले कोविड के चलते कार्यों को गति नहीं मिल पा रही थी। इस बीच नगर निगम की घोषणा के बाद जनरल हाउस भी नहीं हो पाया है। नियमानुसार आयुक्त पार्षदों की बैठक की अध्यक्षता नहीं कर सकता है। इसके लिए मेयर व डिप्टी मेयर ही मान्य है। नगर निगम अधिनियम में वर्तमान अध्यक्ष व उपाध्यक्ष को कार्यकारी मेयर व डिप्टी मेयर बनाए जाने का प्रावधान नहीं है। इसके चलते बैठक न होने से कार्यों के प्रस्ताव पारित नहीं हो सके हैं।