सरकारी बैंकों का अंधेरा कुआं

By: Jun 21st, 2016 12:01 am

(डा. भरत झुनझुनवाला लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं)

यदि किसी पाठक ने सरकारी बैंक से ऋण लेने का प्रयास किया होगा तो उसे भ्रष्टाचार का अनुभव होगा। मैनेजरों ने दलाल नियुक्त कर रखे हैं, जिनके माध्यम से घूस वसूली जाती है। यही कारण है कि सरकारी बैंक घाटे में चल रहे हैं। निजी बैंकों की स्थिति तुलना में अच्छी है। एक रपट के मुताबिक सरकारी बैंकों द्वारा दिए गए 50 प्रतिशत ऋण ओवर ड्यू हो गए हैं यानी समय पर पेमेंट नहीं कर पा रहे हैं। तुलना में प्राइवेट बैंकों द्वारा दिए गए केवल 20 प्रतिशत ऋण ओवर ड्यू हैं…

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने चिंता जताई है कि सरकारी बैंकों द्वारा दिए गए ऋण बड़ी मात्रा में खटाई में पड़ रहे हैं। इससे संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर संकट मंडराने लगा है। याद करें कि 2008 में अमरीकी बैंकों पर संकट उत्पन्न हो गया था। उन्होंने बड़ी मात्रा में लेहमन ब्रदर्स जैसी कंपनियों को ऋण दिए थे। लेहमन ब्रदर्स उस ऋण को वापस नहीं दे पाया था। फलस्वरूप संपूर्ण अमरीकी अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी। इसी प्रकार का संकट अपने देश में भी उत्पन्न हो सकता है। इस भावी संकट से निपटने के लिए वित्त मंत्री ने सरकारी बैंकों की पूंजी में सरकारी निवेश बढ़ाने की योजना बनाई है। जैसे मान लीजिए अमुक सरकारी बैंक द्वारा दिए गए ऋण खटाई में पड़ गए। इस ऋण के रिपेमेंट से बैंक को अपेक्षित राशि प्राप्त नहीं हो रही है। इन ऋणों को देने के लिए बैंक ने जनता से फिक्स डिपाजिट लिए थे। इन फिक्स डिपाजिट का समय पूरा हो गया। बैंक के सामने संकट पैदा हो गया। फिक्स डिपाजिट का भुगतान करना है, परंतु ऋण का रिपेमेंट नहीं आ रहा है। जैसे दुकानदार ने उधार पर माल खरीद कर आपको उधार पर बेच दिया। आप द्वारा दुकानदार को पेमेंट नहीं किया जाए तो दुकानदार के सामने संकट पैदा हो जाता है। इसी प्रकार बैंकों को फिक्स डिपाजिट का पेमेंट करना होता है, परंतु दिए गए ऋण का रिपेमेंट नहीं आने से संकट पैदा हो जाता है।

इस संकट से सरकारी बैंकों को उबारने के लिए वित्त मंत्री ने उनकी पूंजी में निवेश करने की योजना बनाई है। जैसे आपकी दुकान का कर्मचारी चोर है। अपने जान-पहचान वाले ग्राहकों को वह माल सस्ता दे देता है। इस तरह के लेन-देनों का खातों में कोई उचित हिसाब भी नहीं रखा जाता है। दुकान को घाटा लग रहा है। ऐसे में आप घर के जेवर बेचकर दुकान में पूंजी लगाएं तो इसकी क्या सार्थकता है? इस तरह की चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी है कि पहले कर्मचारी पर नियंत्रण स्थापित करें। घाटे की पूर्ति के लिए जेवर बेचना उचित नहीं है। दुकान के विस्तार के लिए घर के जेवर बेचे जाएं तो समझ आता है। इसी प्रकार हमारे सरकारी बैंक घाटे में चल रहे हैं चूंकि इनके कर्मी अकुशल हैं अथवा भ्रष्ट हैं।

यदि किसी पाठक ने सरकारी बैंक से ऋण लेने का प्रयास किया होगा तो उसे भ्रष्टाचार का अनुभव होगा। मैनेजरों ने दलाल नियुक्त कर रखे हैं, जिनके माध्यम से घूस वसूली जाती है। यही कारण है कि सरकारी बैंक घाटे में चल रहे हैं। निजी बैंकों की स्थिति तुलना में अच्छी है। एक रपट के मुताबिक सरकारी बैंकों द्वारा दिए गए 50 प्रतिशत ऋण ओवर ड्यू हो गए हैं यानी समय पर पेमेंट नहीं कर पा रहे हैं। तुलना में प्राइवेट बैंकों द्वारा दिए गए केवल 20 प्रतिशत ऋण ओवर ड्यू हैं। अर्थव्यवस्था की मंदी दोनों प्रकार के बैंकों को बराबर प्रभावित करती है। परंतु सरकारी बैंकों की लचर व्यवस्था के कारण ओवर ड्यू ज्यादा हैं।

सरकारी एवं प्राइवेट बैंकों के मैनेजमेंट में मौलिक अंतर है। सरकारी बैंक के अधिकारियों को बैंक के मुनाफे या घाटे से कम ही सरोकार होता है। उनके बैंक को घाटा लगे तो भी वेतन पूर्ववत बने रहते है। उन्हें मामूली सजा दी जा सकती है जैसे ट्रांसफर कर दिया जाए। तुलना में प्राइवेट बैंक के मालिकों को स्वयं घाटा लगता है। बैंक को घाटा लगा तो उनके शेयरों के दाम गिर जाते हैं। यह मौलिक समस्या सभी सरकारी कंपनियों में विद्यमान है, लेकिन इस अकुशलता के बावजूद विशेष परिस्थितियों में सरकारी कंपनियां बनाई जाती हैं। जैसे स्वतंत्रता के बाद देश में स्टील के उत्पादन को भिलाई जैसी कंपनियां लगाई गईं, चूंकि उस समय प्राइवेट उद्यमियों में स्टील कंपनी लगाने की क्षमता नहीं थी। इसी आधार पर इंदिरा गांधी ने सत्तर के दशक में सरकारी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। उन्होंने सोचा कि प्राइवेट बैंकों द्वारा केवल बड़े उद्यमियों को ऋण दिए जा रहे हैं। आम आदमी को ऋण देने में ये रुचि नहीं लेते हैं। इसलिए इनका राष्ट्रीयकरण कर दिया। बैंकिंग सेवाओं से कटी ग्रामीण जनता को इस सेवा क्षेत्र से जोड़ने के पीछे की मंशा सराहनीय थी। अपेक्षा के अनुरूप इसके बाद ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों का विस्तार भी हुआ, परंतु कुछ ही समय बाद पुरानी स्थिति कायम हो गई।

सरकारी बैंकों ने अपने शाखाएं ग्रामीण क्षेत्रों में अवश्य स्थापित कीं, परंतु इनका मुख्य कार्य गांव की पूंजी को सोख कर शहर पहुंचाना हो गया। देश की ग्रामीण शाखाओं में 100 रुपए जमा होते हैं तो केवल 25 रुपए के ही ऋण इस क्षेत्र में दिए जाते हैं। शेष 75 रुपए मुंबई के माध्यम से बड़े उद्यमियों को पहुंचा दिए जाते हैं। इस प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं के विस्तार के प्रतिकूल परिणाम सामने आए। राष्ट्रीयकरण का अंतिम परिणाम सुखद नहीं रहा है। गरीब को ऋण देने का मुख्य उद्देश्य पूरा नहीं हुआ, बल्कि उद्यमियों को दिए जा रहे ऋण की गुणवत्ता में गिरावट आई, चूंकि अब ऋण अकुशलता एवं भ्रष्टाचार से चलित होते हैं। मूल समस्या है कि बैंक व्यवस्था को आम आदमी के पक्ष में कैसे चलाया जाए। इस कार्य को दो स्तरों पर संपन्न करना होगा। सर्वप्रथम आम आदमी द्वारा ऋण की मांग बढ़ाने की जरूरत है। कहावत है कि घोड़े को पानी तक ले जाना संभव है, परंतु पानी पिलाना संभव नहीं है। इसी तरह ग्रामीण क्षेत्र में ईमानदार मैनेजर बैंक खोल कर बैठा हो, तो भी निरर्थक है, यदि ग्रामीण लोगों का धंधा नहीं चल रहा हो और उनके द्वारा ऋण लेने की मांग ही न की जाए।

आज हमारी अर्थव्यवस्था आटोमैटिक मशीनों की तरफ  बढ़ रही है। आम आदमी के रोजगार घट रहे हैं। इन रोजगारों को संरक्षण देना होगा। इन बिगड़ते हालात में केंद्रीय रिजर्व बैंक एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके लिए रिजर्व बैंक को सख्ती करनी होगी। रिजर्व बैंक ने व्यवस्था बना रखी है कि बैंकों द्वारा दिए गए ऋण का एक हिस्सा छोटे उद्योगों एवं कृषि को दिया जाए, परंतु इसे सख्ती से लागू नहीं किया जा रहा है। इस व्यवस्था को लागू करने के साथ-साथ सभी सरकारी बैंकों का निजीकरण कर देना चाहिए, तब इनमें व्याप्त अकुशलता तथा भ्रष्टाचार से देश को मुक्ति मिल जाएगी। इनके घाटे, अकुशलता एवं भ्रष्टाचार की भरपाई के लिए वित्त मंत्री को पूंजी उपलब्ध नहीं करानी पड़ेगी, बल्कि इनके निजीकरण से भारी मात्रा में धन भी मिलेगा, जिसका उपयोग अन्य जरूरी कार्यों में निवेश के लिए किया जा सकता है।

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