विश्व बैंक के नक्शे कदम पर सरकार

By: Jun 21st, 2016 12:01 am

(डा. भरत झुनझुनवाला लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं)

 सरकार विश्व बैंक के पदचिन्हों पर चल रही है। विश्व बैंक पश्चिमी देशों के इशारे पर काम करता है। विश्व बैंक में वोटिंग के ज्यादा अधिकार अमरीका तथा यूरोप के देशों के पास हैं। इन सरकारों को बहुराष्ट्रीय कंपनियां चलाती हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित साधने के लिए जरूरी है कि विकासशील देशों की अपनी गति को स्थगित कर दिया जाए। आदमी बीमार होता है तो दूसरे की शरण में जाता है। इसी प्रकार विश्व बैंक का प्रयास है कि भारत बीमार हो जाए और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शरण में जाए…

सरकार का दावा है कि अर्थव्यवस्था सात प्रतिशत की सम्मानजनक गति से आगे बढ़ रही है। हकीकत यह है कि जमीनी स्तर पर विकास नहीं दिख रहा है। महाराष्ट्र के एक सीमेंट विक्रेता ने बताया कि बिक्री 30 प्रतिशत कम है। दिल्ली के एक टैक्सी चालक ने कहा बुकिंग कम हो रही है। इसके विपरीत बड़ी कंपनियां ठीक-ठाक हैं। उनके कर्मचारी कहते हैं कि मांग दुरुस्त है। बहरहाल आम आदमी का धंधा कमजोर है। संभवतया इसका प्रमुख कारण मोदी सरकार की ईमानदारी है। शराबी को शराब न दी जाए तो वह सुस्त पड़ जाता है। ऐसे ही हमारी अर्थव्यवस्था को काले धन की लत पड़ चुकी थी। मोदी सरकार इसे सफेद धन की ओर मोड़ रही है। यह एक बड़ा गौरव है। अर्थव्यवस्था के जो क्षेत्र काले धन से चल रहे थे, उनमें सुस्ती आ रही है।

इस दुष्प्रभाव को प्रापर्टी बाजार में स्पष्ट देखा जा सकता है। इस बाजार में नेताओं द्वारा दो तरह से धंधा किया जाता था। पहले सरकारी जमीन को बिल्डर को सस्ते दाम पर आबंटित कर दिया जाता था। इससे बिल्डर की लागत कम हो जाती थी। 300 करोड़ की जमीन उसे तीन करोड़ में मिल जाती थी। फलस्वरूप वह खरीददार को न्यून दाम पर बेच पाता था। साथ-साथ नेताओं और अधिकारियों द्वारा काले धन को प्रोजेक्ट में लगाया जाता था। इससे बिल्डर की निवेश करने की क्षमता बढ़ जाती थी। मोदी सरकार ने यह काला धन बंद कर दिया है। बिल्डर को न तो सस्ती जमीन मिल रही है और न ही नेता का काला धन। इसी प्रकार फैक्टरी लगाने को प्रदूषण एनओसी पहले घूस देकर 10 लाख रुपए में मिल जाती था। अब प्रदूषण नियंत्रण प्लांट लगाना पड़ रहा है, जिसमें दो करोड़ लगते हैं। इससे उत्पादन लागत बढ़ रही है और उद्यमी पीछे हट रहे हैं।

इस दुरुह परिस्थिति में मोदी सरकार की नीतियों ने अर्थव्यवस्था की बची खुची हवा भी निकाल दी है। सरकार विश्व बैंक के पदचिन्हों पर चल रही है। विश्व बैंक पश्चिमी देशों के इशारे पर काम करता है। विश्व बैंक में वोटिंग के ज्यादा अधिकार अमरीका तथा यूरोप के देशों के पास हैं। इन सरकारों को बहुराष्ट्रीय कंपनियां चलाती हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित साधने के लिए जरूरी है कि विकासशील देशों की अपनी गति को स्थगित कर दिया जाए। आदमी बीमार होता है तो दूसरे की शरण में जाता है। इसी प्रकार विश्व बैंक का प्रयास है कि भारत बीमार हो जाए और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शरण में जाए। इस उद्देश्य को साधने के लिए विश्व बैंक ने हिदायत दी है कि भारत द्वारा वित्तीय घाटे को न्यून रखा जाए। सरकार द्वारा ऋण लेकर हाई-वे अथवा पावर प्लांट न बनाए जाएं। गांवों में वाई-फाई का प्रसार न हो तथा उद्योगों को प्रदूषण नियंत्रण प्लांट लगाने के लिए सरकार सबसिडी न दे। ऐसे में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ये काम किए जाएंगे और इसका लाभ कमाने का अवसर देश के उद्यमियों के स्थान पर उन्हें मिलेगा।

विश्व बैंक की नीति सफल हो सकती थी यदि अर्थव्यवस्था में तेजी होती। जैसे बीमार आदमी बाहुबली प्रधानजी के पास मदद मांगने गया, परंतु प्रधान का प्रापर्टी प्रोजेक्ट स्वयं संकट में हो तो मदद नहीं मिलती है। इसी प्रकार विश्व अर्थव्यवस्था में चौतरफा मंदी व्याप्त है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां स्वयं संकट में हैं। ऐसे में वे भी निवेश से विमुख हैं। अतः विश्व बैंक की नीति असफल है। मोदी सरकार की ईमानदारी के कारण काले धन पर नियंत्रण हुआ है। यह सरकार की उपलब्धि का सकारात्मक पहलू है। परिणाम यह हुआ है कि काले धन से चल रही अर्थव्यवस्था मंद पड़ी है। दुर्भाग्यवश विश्व बैंक के पदचिन्हों पर चलने के कारण सफेद धन की अर्थव्यवस्था भी मंद पड़ गई है। विश्व अर्थव्यवस्था में व्याप्त मंदी के कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी निवेश से कतरा रही हैं। अर्थव्यवस्था के विकास के तीनों इंजन यानी काला धन, सरकारी खर्च और विदेशी निवेश सुस्त पड़े हुए हैं।

अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए इन तीनों में से एक को ठीक से चलाना ही होगा। काले धन को छूट देना अनैतिक है और देश के दीर्घकालीन विकास में बाधक है, साथ ही भाजपा के ईमानदार शासन उपलब्ध कराने के वादे के विपरीत है। अतः कांग्रेस के इस रास्ते को अपनाना अनुचित होगा। दूसरा मॉडल विदेशी निवेश का है। इस इंजन की चाल हमारे हाथ में नहीं है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां तब ही भारत में निवेश करेंगी, जब उनके देशों में माल की मांग हो। जैसे फिनलैंड में मोबाइल फोन की मांग हो तो नोकिया द्वारा भारत में मोबाइल फोन बनाने की फैक्टरी लगाई जा सकती है। परिस्थिति यह है कि नोकिया अपने स्टॉक में रखे माल को ही नहीं बेच पा रही है। ऐसे में वह भारत में अपना प्रोजेक्ट नहीं लगाएगी। मोदी के मेक इन इंडिया प्रोग्राम के असफल होने का यही कारण है। सरकार द्वारा बताया जा रहा है कि विदेशी निवेश में भारी मात्रा में वृद्धि हुई है। ये आंकड़े तकनीकी दृष्टि से सही हो सकते हैं, परंतु वास्तविक नहीं हैं। आने वाले विदेशी निवेश में भारत से बाहर भेजी जाने वाली पूंजी का बड़ा हिस्सा है। अपना ही पैसा विदेश घूमकर वापस घर आ रहा है। पिछले वर्ष भारत से बाहर जाने वाली पूंजी में भारी वृद्धि हुई है। भारतीय निवेशकों द्वारा अपनी पूंजी को विदेश भेजकर विदेशी निवेश के रूप में वापस लाया जा रहा है। यही कारण है कि विदेशी निवेश में कथित वृद्धि के बावजूद अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ी हुई है।

अर्थव्यवस्था के तीन इंजन में दो नाकाम हैं। काला धन अनैतिक है। सच्चा विदेशी निवेश पस्त है। ऐसे में एक मात्र इंजन सरकारी निवेश ही अर्थव्यवस्था को गति दे सकता है। सरकार ऋण लेकर अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा सकती है। एक उदाहरण से बात स्पष्ट हो जाएगी। मान लीजिए कोई उद्यमी फैक्टरी लगाना चाहता है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ईमानदार है। उसे प्रदूषण नियंत्रण प्लांट लगाना ही होगा। इसमें दो करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च आता है। इस खर्च को वहन न कर पाने के कारण वह फैक्टरी लगाने में असमर्थ है। सरकार के सामने विकल्प है कि नई फैक्टरी पर सबसिडी दे। दो करोड़ के प्रदूषण नियंत्रण प्लांट पर 50 लाख की सबसिडी दे दे। उद्यमी के लिए फैक्टरी लगाना लाभप्रद हो जाएगा और अर्थव्यवस्था में गति आ जाएगी, परंतु विश्व बैंक ने ऐसा करने को मना कर रखा है। अतः मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था के तीसरे स्विच को भी ऑफ  कर दिया है। परिणामस्वरूप सच्चाई से मिलने वाले लाभ को अनायास ही बहाया जा रहा है। सरकार को चाहिए कि विश्व बैंक की इन बातों की अनसुनी करक देश में सच्चे सरकारी निवेश को बढ़ाए व मंदी को तोड़े। दो साल बीत चुके हैं। समय फिसलता जा रहा है। अर्थव्यवस्था को उर्घगामी बनाने के लिए तत्काल परिवर्तन करना चाहिए।

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