रेल के कायाकल्प में जुटे प्रभु

By: Jun 21st, 2016 12:01 am

(डा. भरत झुनझुनवाला लेखक, आर्थिक विश्लेषक  एवं टिप्पणीकार हैं)

रेल मंत्री ने आधुनिक तकनीकों के उपयोग से खर्च घटाने एवं कार्य कुशलता बढ़ाने पर भी जोर दिया है। जैसे खरीद को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किया जाएगा। इससे माफिया के गठबंधन को तोड़ा जा सकेगा। नए खिलाड़ी प्रवेश कर सकेंगे। नियुक्तियां भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से की जाएंगी। नियुक्तियों में व्याप्त भ्रष्टाचार कम होगा, कुशल आवेदकों की नियुक्ति होगी तथा रेल व्यवस्था की कार्य कुशलता में सुधार होगा। प्रश्न है कि ये उपाय पर्याप्त होंगे कि नहीं…

रेल मंत्री सुरेश प्रभु द्वारा भारतीय रेल को नई दिशा देने का योगदान सराहनीय है। अब तक रेल मंत्रियों द्वारा आवश्यकता पड़ने पर किराए में वृद्धि की जाती थी। रेल मंत्री ने इस परंपरा में परिवर्तन किया है। उन्होंने गैर किराया आय बढ़ाने की ओर कदम उठाए हैं। जैसे रेलवे के डिब्बों के अंदर, रेलवे के प्लेटफार्म पर, सूचना के स्क्रीन पर एवं रेलवे की टिकटों पर विज्ञापन लगाए जा सकते हैं। रेलवे के पास बड़ी मात्रा में सरप्लस जमीन है, जिसका भी उपयोग किया जा सकता है। रेल मंत्री ने बताया कि दूसरे देशों में रेलवे की गैर किराया आमदनी 30 प्रतिशत तक है, जबकि भारत में यह मात्र पांच प्रतिशत है।

रेल मंत्री ने आधुनिक तकनीकों के उपयोग से खर्च घटाने एवं कार्य कुशलता बढ़ाने पर भी जोर दिया है। जैसे खरीद को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किया जाएगा। इससे माफिया के गठबंधन को तोड़ा जा सकेगा। नए खिलाड़ी प्रवेश कर सकेंगे। नियुक्तियां भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से की जाएंगी। नियुक्तियों में व्याप्त भ्रष्टाचार कम होगा, कुशल आवेदकों की नियुक्ति होगी तथा रेल व्यवस्था की कार्य कुशलता में सुधार होगा। प्रश्न है कि ये उपाय पर्याप्त होंगे कि नहीं। जमीनी हकीकत यह है कि रेलवे की आय में गिरावट आ रही है। वर्ष 2015-2016 में रेलवे की कुल आय में 4.5 प्रतिशत मात्र की वृद्धि हुई थी, जबकि इससे पहले के पांच वर्षों में वृद्धि दर 10 से 18 प्रतिशत थी। आय में इस गिरावट का कारण अर्थव्यवस्था में व्याप्त चौतरफा मंदी है। लोग यात्रा कम कर रहे हैं। माल की ढुलाई में वृद्धि भी कम है। ऐसे में रेल के सुधारों के लिए आंतरिक आय से रकम प्राप्त करना कठिन होगा। केंद्र सरकार द्वारा बजट से दी जाने वाली रकम में भी वृद्धि की संभावना भी कम है। एक रपट के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा दी जा रही मदद को गत वर्ष के 40,000 करोड़ से घटाकर वर्ष 2015-2016 में 28,000 करोड़ कर दिया गया था। दूसरी रपट के अनुसार प्रधानमंत्री ने चालू वर्ष में मदद को 40,000 करोड़ से बढ़ाकर 60,000 करोड़ करने का आश्वासन दिया है। केंद्र सरकार की स्वयं की आय में गिरावट को देखते हुए इस आश्वासन का फलीभूत होना संदेहपूर्ण है।

निजी पूंजी की भी सीमा है। निजी क्षेत्र के निवेशक देखते हैं कि लगाई गई पूंजी पर लाभ कमाया जा सकेगा अथवा नहीं। रेल की कुल आय दबाव में होने के कारण रेल की योजनाओं का लाभकारी होना संदेहास्पद बना रहता है। जैसे कोनकेन रेलवे कारपोरेशन की तर्ज पर सरकार यदि कश्मीर में श्रीनगर रेल योजना के लिए पूंजी निवेश आकर्षित करे, तो सफलता कम ही दिखती है। समस्या ज्यादा विकट है, चूंकि रेलवे पर सातवें वेतन आयोग का भार पड़ने को है। अतः रेल मंत्री के प्रयासों के बावजूद रेल में निवेश सूखते दिख रहे हैं।

इस विकट परिस्थिति के बावजूद गत वर्ष भारतीय रेल ने पूंजी निवेश में भारी वृद्धि की है। गत वर्ष 37 हजार करोड़ की तुलना में इस वर्ष 94 हजार करोड़ के पूंजीगत खर्च किए गए हैं। यह वृद्धि स्वागत योग्य है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये खर्च लाइफ  इंश्योरेंस कारपोरेशन से ऋण लेकर किए गए हैं। वित्त मंत्री के इशारे पर लाइफ  इंश्योरेंस कारपोरेशन ने यह रकम रेल मंत्रालय को उपलब्ध कराई होगी, ऐसा माना जा सकता है। सरकार द्वारा लाइफ  इंश्योरेंस के पालिसी धारकों की पूंजी को घुमाया जा रहा है। रेल के लिए यह सुलभ भले ही हो पर पालिसी धारकों के प्रति यह छलावा है। एलआईसी द्वारा वहां निवेश किया जा रहा है, जहां निजी निवेशक आने में कतरा रहे हैं। संभवतया यह निवेश विश्वशनीय न हो।

जापान द्वारा अहमदाबाद मुंबई बुलेट ट्रेन के लिए 80 प्रतिशत ऋण 0.1 प्रतिशत न्यूनतम ब्याज दर पर देने का अनुबंध हुआ है। प्रश्न यह है कि जापान इस विशाल रकम को देना क्यों चाहता है? यह जापान का भारत के प्रति निःस्वार्थ प्रेम नहीं है। ज्ञात हो गरीब देशों को मदद के लिए जापान द्वारा रकम कम ही उपलब्ध कराई जाती है। स्वीडन, नार्वे तथा फिनलैंड जैसे छोटे यूरोपीय देशों द्वारा भारी रकम उपलब्ध कराई जा रही है। इससे संकेत मिलता है कि जापान द्वारा यह मदद भारत की मदद के लिए नहीं, अपितु अपने वाणिज्यिक स्वार्थों को हासिल करने के लिए की जा रही है। जैसे जापानी कंपनियों के द्वारा बुलेट ट्रेन के इंजन तथा सिग्नल हमें महंगे बेचे जा सकते हैं।

विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को दी जा रही मदद में लगातार आरोप लगता आ रहा है कि डोनर देश की रकम का बड़ा हिस्सा वापस हासिल कर लिया जाता है। जैसे आस्ट्रेलिया ने बच्चों के स्वास्थ्य के लिए दूध उपलब्ध कराने के कार्यक्रम के लिए भारत को मदद दी। साथ-साथ शर्त लगा दी कि पाउडर मिल्क की खरीद आस्ट्रेलिया से ही की जाएगी। इसी प्रकार अपने रेल उत्पादन कारखाने को प्रोमोट करने के लिए जापान द्वारा ऋण दिया जा रहा है। अप्रमाणित तकनीकों की टेस्टिंग के लिए भी भारत में निवेश किया जा सकता है।

जापान द्वारा 80 प्रतिशत ऋण देने के बाद भी शेष 20 प्रतिशत रकम को भारत में जुटाना कठिन होगा। रेल मंत्री के सामने एक विकल्प रेल की कार्य कुशलता में सुधार लाने का है। कुछ समय पहले सेंट्रल विजिलेंस कमीशन की रपट में कहा गया था कि भ्रष्टाचार की सर्वाधिक शिकायतें रेल मंत्रालय के कर्मचारियों के संबंध में मिली हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारतीय रेल में कर्मचारियों की कुशलता विश्व की प्रमुख रेलों की तुलना में कम है। रेल मंत्री को चाहिए कि रेल कर्मियों की कुशलता बढ़ाने और इनमें व्याप्त भ्रष्टाचार के नियंत्रण पर जोर दें। इस दिशा में कुछ अच्छे कदम उठे हैं जो प्रशंसनीय हैं। जैसे करेंट रिजर्वेशन को इंटरनेट पर खोल दिया गया है। गाड़ी का चार्ट बनने के बाद रिक्त बर्थ की बुकिंग ऑनलाइन कराई जा सकती है। इसे आगे बढ़ाते हुए चलती ट्रेन में उपलब्ध बर्थ की बुकिंग को ऑनलाइन किया जा सकता है। रेल द्वारा भारी मात्रा में माल की खरीद की जाती है। रेल मंत्री ने सभी खरीद को इलेक्ट्रॉनिक मोड से करने की घोषणा की है, लेकिन इससे भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा। घटिया माल की सप्लाई की जा सकती है। अतः सतर्कता विभाग को चुस्त बनाया जा सकता है। ऐसे अनेक बिंदु हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है।

मूलभूत आवश्यकता भारतीय रेल में भारी मात्रा में निवेश करने की है। सरकारी तथा निजी स्रोतों से इसे जुटा पाना कठिन है। मेरा मानना है कि एलआईसी, जापान से ऋण तथा कार्य कुशलता में सुधार से पर्याप्त पूंजी नहीं उपलब्ध हो पाएगी। अतएव रेल मंत्री को किराए में वृद्धि पर भी विचार करना चाहिए। विशेषकर लोकल ट्रेन पर रेल का खर्च ज्यादा और आय कम है। इसमें वृद्धि की जानी चाहिए। आंतरिक बचत से निवेश की युक्ति निकालनी चाहिए।

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