मोदी विरोध की धारणा

By: May 26th, 2015 12:15 am

आज मोदी सत्ता की पहली सालगिरह है। उन्हें बधाई और देश के लिए निरंतर बेहतर काम करते रहने की शुभकामनाएं…। लेकिन एक अवांछित, अप्रत्याशित और अभूतपूर्व धारणा मन को टीस देती है। सिर्फ  पहली सालगिरह तक ही किसी भी प्रधानमंत्री को यूं कटघरे में खड़ा नहीं किया गया। आम धारणा यह रही है कि अभी तो एक ही साल हुआ है, लिहाजा योजनाओं और सुधार की बुनियाद रखी जा रही होगी। नेहरू से मनमोहन सिंह तक किसी भी प्रधानमंत्री को ऐसी राष्ट्रीय धारणा नहीं झेलनी पड़ी होगी। सभी को पर्याप्त समय दिया गया है। प्रधानमंत्री मोदी विवश नहीं हैं कि उस धारणा के जवाब में रपटें पेश करें, लेकिन यह उनकी सरकार और भाजपा का फैसला है कि सालगिरह के रिपोर्ट कार्ड पेश किए जाएं, ताकि देश तय कर सके। आजकल विरोध के नाम पर एक तबका ऐसी तस्वीर बना रहा है मानों मोदी सत्ता के प्रति, एक ही साल में, मोहभंग सरीखी स्थिति बन गई हो! प्रधानमंत्री मोदी को किसान, मजदूर और गरीब विरोधी करार दिया जा रहा है। लेकिन सालगिरह के मौके पर जितने भी सर्वे सामने आए हैं, उनमें देश की 48 फीसदी से 72 फीसदी तक जनता मोदी सत्ता के कामों, प्रयासों और फैसलों से बेहद संतुष्ट है। उनमें इस धारणा का कोई उल्लेख नहीं है। किसान विरोधी होने के आरोप को अब आंदोलन का रूप दिया जा रहा है। सवाल है कि आज देश के किसान की जो स्थिति है, क्या वह मोदी सत्ता के एकसाला कार्यकाल की देन है? किसान गरीबी, कंगाली, बदहाली, अशिक्षा, कर्ज और तीन-चार हजार रुपए माहवार की औसतन आमदनी में ही जीने को अभिशप्त है, क्या उनका कारण भी मोदी सत्ता है? कमोबेश यह पहली केंद्र सरकार है, जिसने बिलकुल खराब और पूरी तरह भीगी फसल को भी, तय दामों पर, खरीदने का फैसला लिया है और मौसम से आहत, त्रासद किसान को अभूतपूर्व मुआवजा मुहैया कराने का कैबिनेट ने निर्णय लिया था। क्या ये किसान विरोधी कदम हैं? संभव है कि मुआवजा बंटने में देरी हुई होगी। यह राज्यों का दायित्व है। प्रधानमंत्री चौपाल-चौपाल जाकर ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि हमारे देश का चरित्र संघीय है और सभी की शक्तियां और दायित्व तय हैं। ऐसी संभावित कोताही के आधार पर ही मोदी सत्ता को किसान विरोधी की गाली नहीं देनी चाहिए। विश्लेषण विवेकसम्मत होने चाहिए। आलोचना का अधिकार लोकतांत्रिक है,लेकिन दुष्प्रचार से नुकसान देश का ही होता है। बहरहाल पूरी बहस मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण ह्यह्यध्यादेश और संसद में विचाराधीन बिल के कारण ही है। यह किसी भी दल या सांसद का विशेषाधिकार है कि संसद में वह किस बिल पर सहमति जताए या उसका विरोध करे अथवा संशोधन पेश करे। जब संसद में फिलहाल ये तमाम स्थितियां मौजूद हैं और राज्यसभा की प्रवर समिति इस बिल की समीक्षा कर रही है, तो प्रधानमंत्री मोदी और उनकी एकसाला पुरानी सरकार को किसान विरोधी करार देने का औचित्य क्या है? मोदी सत्ता के लिए उद्योगपति और किसान, गरीब, आम आदमी सभी दो आंखों की तरह हैं, क्योंकि वे देश के नागरिक हैं। ऐसा संभव नहीं है कि सरकार उद्योगपतियों की तिजोरी भर दे और गरीब की झोली में छेद कर दे। ऐसा होगा, तो देश में क्रांति का नया तूफान खड़ा हो जाएगा और मोदी सत्ता भी बच नहीं पाएगी। लिहाजा इन आरोपों पर ही राजनीति नहीं की जा सकती, क्योंकि देश का औसत नागरिक कमोबेश इतनी जानकारी तो रखता है कि अंततः सरकार क्या कर रही है? देश में भूमि अधिग्रहण की परंपरा पुरानी है और बड़ी कंपनियों को जमीन मुहैया कराई जाती रही है। खुलासा करे कांग्रेस और दूसरे विरोधी कि 45636 हेक्टेयर जमीन ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’ (एसईजेड) के लिए अधिगृहित की गई, तो वह बुनियादी तौर पर किसके लिए थी? उसमें से करीब 28000 हेक्टेयर का ही इस्तेमाल किया जा सका। शेष भूमि किनके पास है और क्यों? किसानों को अतिरिक्त मुआवजे के साथ वह जमीन लौटाई क्यों नहीं गई? किसानों के बच्चों को नौकरी तो मिल नहीं पाई, लेकिन एसईजेड के जरिए अपेक्षित व्यापार और निर्यात भी नहीं हो पाया। यह निर्णय मोदी सत्ता का नहीं था। इसके अलावा, जो करीब 5.5 लाख एकड़ बंजर जमीन पड़ी है, वह भी ऐतिहासिक देन है। उसका अधिग्रहण पहले क्यों नहीं किया गया? उसकी लैंड बैंक क्यों नहीं तैयार किया गया? मोदी सरकार की तो साफ  प्रतिबद्धता है कि पहले बंजर जमीन का अधिग्रहण किया जाएगा। बाद में मजबूरन दूसरी उपजाऊ जमीन ली जाएगी। कांग्रेस मोदी सरकार के इस ऐलानिया वादे पर भरोसा क्यों नहीं करती? यदि सरकार अपनी प्रतिबद्धता के खिलाफ  जाती है, तो संसद में उसके खिलाफ  अवमानना का विशेषाधिकार प्रस्ताव लाया जा सकता है और सरकार की थू-थू हो सकती है, लेकिन खोखली और गलत सूचनाओं पर आधारित आंदोलन छेड़ने से हासिल क्या होगा? मोदी सत्ता ने तो खेत की मिट्टी की सेहत, सिंचाई, बीज, कर्ज और खेती के मूल्यों की भी चिंता की है और योजनाएं बनाई गई हैं, बनाई जा रही हैं। दरअसल अरुण जेटली सही कहते हैं कि ‘अच्छे दिन’ कोई नारा नहीं है, एक प्रक्रिया है। दरअसल इसे 15 लाख रुपए तक सीमित करके न देखा जाए। सभी के लिए घर, ग्रामीण आवास, डिजिटल इंडिया से लेकर जन-धन और 12 रुपए सालाना किस्त में जीवन बीमा, पेंशन तक और 20000 करोड़ का मुद्रा बैंक किसके लिए है? जाहिर है कि आम आदमी और गरीब के लिए है। कुछ घोषणाएं प्रधानमंत्री मोदी खुद करेंगे। उनकी समीक्षा आगे पढ़ें, लेकिन यह जरूर सोचें कि ‘किसान टीवी चैनल’ की शुरुआत किसके लिए की गई है? जाहिर है कि धन्नासेठों का इससे कोई लेना-देना नहीं है। सरकार इसका संचालन करेगी, तो आर्थिक हिस्सेदारी का भी सवाल नहीं है। लिहाजा सालगिरह के मौके पर इस बेजा विरोध पर पुनर्विचार किया जाए और ठोस मुद्दों की बात की जाए।