पद्म पुराण

By: Nov 15th, 2014 12:12 am

इस पर हाथी ने उनसे कहा कि मेरा रोग दवाइयों से दूर नहीं होगा। आप कृपा करके भगवत गीता के सप्तदश अध्याय का पाठ करने वाले ब्राह्मण को बुलाइए। राजा ने फिर वैसा ही किया। गीता पाठ सुनकर उस पानी को हाथी पर छिड़क दिया। ब्राह्मण द्वारा गीता के सप्तदश अध्याय के पाठ के प्रभाव से राजा को भी परम पद प्राप्त हुआ और उसकी सहज मुक्ति हो गई।

अष्टदश अध्याय का फल- भगवान शंकर ने पार्वती से कहा कि गीता का अठाहरवां अध्याय अविद्या का नाश करने वाला, मोक्षदायक और संसार की यातना को नष्ट करने वाला है। इसके विषय में मैं एक कथानक सुनाता हूं। विश्वकर्मा के द्वारा बनाई गई देवपुरी में देवराज इंद्र शचि के साथ बैठे हुए थे तो विष्णु के दूत वहां आए और उन्होंने इंद्र को सिंहासन से हटा दिया। एक नए पुरुष को उस पर बैठा दिया। वहां उपस्थित अप्सराएं, गंधर्व, किन्नर उस नए इंद्र के स्वागत में नृत्यगान करने लगे। इंद्र ने सोचा कि जिस व्यक्ति को यह पद मिला है, उसने कोई भी तो पुण्य कर्म नहीं किया, यज्ञ आदि नहीं किए और कोई आलौकिक कर्म नहीं किया फिर उसे यह पद कैसे प्राप्त हुआ। इंद्र ने भगवान विष्णु की शरण में जाकर अपनी जिज्ञासा व्यक्त की और पूछा कि मुझे- जिसने आपको प्रसन्न करने के लिए सौ अश्वमेध यज्ञ किए, उसे-आपने हटाकर यह इंद्र पद किसको दिया है, मुझे यह बताइए कि इसने कौन-सा पुण्य कर्म किया है। यह सुनकर भगवान ने उत्तर दिया कि इस व्यक्ति का सबसे बड़ा पुण्य गीता के अष्टादश अध्याय का नियमित पाठ है। इस पाठ के कारण ही इसे इंद्र पद की प्राप्ति हुई है। तुम भी ऐसा ही कर सकते हो। भगवान से यह वचन  सुनकर इंद्र ब्राह्मण के वेश में गोदावरी नदी के किनारे आया और उसने एक ब्राह्मण के पास आकर अठाहरवां अध्याय पढ़ा। उसके प्रभाव के कारण इंद्र के मन में उत्तम भाव जागृत हुए और उसने अपने राज्य की साजुतय भक्ति को प्राप्त किया। भगवान शंकर ने गीता के अठारह अध्यायों का फल बताकर यह कहा कि यह भगवत गीता उपनिषद रूपी गऊओं से भगवान ने स्वयं अर्जुन के लिए अमृत रूपी दूध का दोहन किया है। इस अमृत रूपी दूध का सेवन कोई भाग्यशाली ही कर सकता है। यह वह अमृत है जिसे पान कर मनुष्य शोक से छुटकारा पा लेता है और विष्णुलोक को प्राप्त होता है। गीता के ज्ञान में डुबकी लगाने से मनुष्य के जन्म-जन्मांतरों के सचित पाप हमेशा के लिए धुल जाते हैं। गीता के लिए कहा गया है कि यह केवल एक ही शास्त्र है जो भगवान कृष्ण की महिमा से मंडित है और श्रीकृष्ण ही इसके द्वारा प्रतिपादित एकमात्र जगदीश्वर और आराध्य हैं। भगवान श्रीकृष्ण के अनेक नामों के जपने से मनुष्य को परम पद की प्राप्ति हेती है। इस तरह गीता के महत्त्व को बताकर भगवान शंकर भगवान नारायण का ध्यान करने लगे। पार्वती गीता के दिव्य ज्ञान को सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुई और भगवान कृष्ण की मोहिनी मूर्ति का ध्यान करके भक्ति भाव से भर गईं। इस प्रकार व्यास ने ऋषियों को गऊ की पूजा और गुरु के वचनों में आस्था रखने वाले राजा दिलीप के विषय में बताया। वे मनु के वंश में पैदा हुए थे। वे अत्यंत प्रतापी तथा प्रजा के पालक थे। उनकी पत्नी भी उदारता और कोमलता की मूर्ति थीं।