हाइकमान की कसौटी पर खरा उतरना होगा

By: Sep 2nd, 2012 12:15 am

इस बार फिजाएं जटिल दिख रही हैं। भाजपा के हौसले बुलंद हैं। कांग्रेस में बदलाव के कारण नेताओं को एडजस्ट होने के लिए समय चाहिए। सत्तापक्ष इसका लाभ उठाने के मौके में रहेगा। ऐसे में जीत हो या हार, जिम्मेदारी वीरभद्र सिंह की ही रहेगी।

हिमाचल कांग्रेस में उलझी सियासत को दिल्ली सल्तनत की सूझबूझ ने सुलझा लिया और वीरभद्र सिंह को प्रदेश की गद्दी पर बिठा दिया गया। निश्चय ही सोनिया गांधी ने जो ख्वाब हिमाचल में कांग्रेस को लाने का देखा है, उस ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए उन्होंने राजा को चुना। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि वीरभद्र सिंह को प्रदेश की कमान सौंपना हाइकमान का एक बेहतरीन कदम है। विश्लेषकों का मत है कि राजा की जनमानस में इतनी पकड़ है कि वह आसानी से प्रदेश राजनीतिक में बदलाव ला सकते हैं। 2007 में यदि समय से पहले चुनाव न होते, एकदम आचार संहिता न लागू होती तो शायद हिमाचल में राजनीति की कहानी कुछ और होती, क्योंकि उनकी सरकार के प्रति किसी को निराशा नहीं थी। मीडिया और विश्लेषकों का मत है कि राजा जैसे कद्दावर नेता के सिवाय कांग्रेस की नैया कोई भी पार नहीं लगा सकता। एक मुख्यमंत्री होने के नाते वह हर वर्ग की दिक्कत ध्यान से सुनते थे और सबको साथ लेकर चलते थे। अब जब उन्हें हाइकमान ने दोबारा प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी है तो जनता में फिर नया जोश भर गया है। अब राजा को अपने घोषणापत्र में ऐसे निर्णय शामिल करने होंगे, जो पहले अधूरे रह गए हैं। पांच बार मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश की बागडोर संभालने वाले वीरभद्र सिंह को अब दिखाना होगा कि वह सच में जनता के दिलों पर राज करते हैं।