यहां तो सभी रण छोड़ साबित होते रहे

By: Sep 2nd, 2012 12:15 am

* फाइटर की फाइट में नहीं रहा कभी कोई द्य कांग्रेस में भावी सीएम पर वर्षों से सियासी जंग
* आलाकमान को भी 2003 में माननी पड़ी पैठ द्य नंबर गेम में वीरभद्र रहे हमेशा ऊपर 
* सुखराम के बाद विद्या स्टोक्स को भी करना पड़ा सब्र

प्रदेश कांग्रेस की हालत अब ऐसी कही जा सकती है कि यहां तो सभी रण छोड़ साबित हो रहे हैं। पांच बार हिमाचल के मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह का रुख उनके तेवर फिर से महत्त्वाकांक्षी कांग्रेस लीडरों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं। कांग्रेस की सियासी जंग में हर वह वर्कर गवाह है कि जनाधार  बनाने के नाम पर भावी सीएम की फेहरिस्त में खड़े रहे सुखराम, विद्या स्टोक्स सहित कुछ बड़े स्व. नेता फिसड्डी साबित हुए। हर बार व बार-बार वीरभद्र सिंह फाइटर के तौर पर आगे आए और सियासत की इस फाइट में सभी को सब्र करना पड़ा। कभी डर का तो कभी नंबर गेम में हार कर। वर्ष 1992 में पूर्व केंद्रीय दूरसंचार मंत्री सुखराम ने भी कांग्रेस के 20 एमएलए अपने साथ होने का चंडीगढ़ में दावा जता दिया। कांग्रेस का इतिहास गवाह है कि शिमला पहुंचने तक उनकी संख्या 10 भी नहीं रह सकी। वर्ष 1998 के पार्टी संगठन चुनावों में पर्यवक्षेक बनकर हनुमंत राव हिमाचल आए। उन्होंने वीरभद्र सिंह के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया, मगर महत्त्वाकांक्षी नेताओं की उनके कंधों पर बंदूक चलाने की कवायद  ज्यादा सफल न हो सकी। 1997 में सुखराम ने जरूर हिविकां का गठन कर कांग्रेस को चुनौती दी और भाजपा-हिविकां गठबंधन की सरकार बनी। उस दौरान भी वीरभद्र सिंह को बाहर रखने की शर्त पर कांग्रेस को समर्थन का ऐलान किया गया, मगर कांग्रेस में वीरभद्र सिंह समर्थकों ने इसे नहीं माना। 2003 से पूर्व हुए पार्टी संगठन चुनावों में वीरभद्र समर्थकों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया। एक बार तो ऐसा लगा कि अब वर्चस्व की इस जंग में वीरभद्र सिंह पिछड़ जाएंगे। हालांकि विधानसभा चुनावों में टिकट आबंटन भी कुछ ऐसा ही हुआ था। बावजूद इसके नतीजों के बाद ज्यादातर कांग्रेस विधायकों का रुख वीरभद्र सिंह की ओर रहा। तब राज्य के प्रभारी रह चुके आरके धवन को हाइकमान ने विधायकों की राय जानने का जिम्मा सौंपा था। विधानसभा परिसर के लाउंज में राय जानी गई और विद्या स्टोक्स पिछड़ गईं। वीरभद्र सिंह पांचवीं बार मुख्यमंत्री बने। अब फिर से वही वर्चस्व की जंग चली है। हाइकमान ने चार वर्ष पहले प्रदेश में बदलाव की खातिर कौल सिंह को अध्यक्ष पद की कमान सौंपी और उन्हें दूसरी बार भी अध्यक्ष बनाया गया। यहां तक कि उन्हें भावी मुख्यमंत्री के तौर पर भी प्रोजेक्ट किया गया। उनके समर्थकों की भी फेहरिस्त कम नहीं थी। मंडी में उनके नाम लेने वालों की कतार बढ़ती रही। इससे बाहर भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई, मगर वीरभद्र सिंह व उनके समर्थक अब फिर से हावी दिख रहे हैं। विधानसभा चुनावों की संध्या पर हाइकमान कोई भी जोखिम उठाने को तैयार नहीं, वह भी ऐसे में जब गुजरात व कर्नाटक जैसे राज्यों से कांग्रेस के खिलाफ अंधड़ की खबरें दिल्ली पहुंच रही हों। वीरभद्र सिंह को हिमाचल में जनाधारयुक्त नेता माना जा रहा है। जब भी विपरीत परिस्थितियां आईं, उन्होंने कांग्रेस को अपने पीछे चलाने की मिसाल पेश कर दी। यहां तक कि इस बार उनके विरोधी भी कम नहीं हैं, मगर फिलवक्त वीरभद्र सिंह पार्टी की सियासत में तो हावी दिख ही रहे हैं।