घाटे में चल रहे स्थानीय निकाय

By: Dec 11th, 2010 6:49 pm

प्रदेश के अधिकतर स्थानीय निकाय घाटे में चल रहे हैं। शहरी निकायों की आमदनी अठन्नी तथा खर्चा रुपया होने से इनका घाटा बढ़ता जा रहा है। इन्हें स्वयं ही बजट जेनरेट करना पड़ता है,राज्य सरकार की ओर से नाममात्र बजट ही निकायों को दिया जाता है। सरकार ने आय को अर्जित करने के लिए निकायों को अधिकृत कर रखा है। स्थानीय निकाय पानी के बिलों, हाउस टैक्स, पार्किंग स्थलों व दुकानों से किराया वसूलकर अपनी आय चलाते हैं, लेकिन आय का अधिकांश हिस्सा नगर निकाय के कर्मचारियों के वेतन भुगतान में ही लग जाता है।  स्थानीय निकाय के घाटे का भी यही कारण है। अकेले शिमला नगर निगम ही करीब एक अरब रुपए के घाटे में चल रहा है। सोलन नगर परिषद करीब तीन करोड़ के घाटे में हैं। इसी प्रकार अन्य स्थानीय निकाय भी घाटे में हैं।  राज्य सरकार स्थानीय निकाय को वार्षिक बजट का करीब 10-25 फीसदी तक ही देती है। यही वजह है कि स्थानीय निकायों की हालत माली होती जा रही है।  प्राप्त जानकारी के मुताबिक निकाय की कुल आय का तकरीबन 45 फीसदी हिस्सा कर्मचारियों के वेतनमान देने, 30 फीसदी हिस्सा शहर के पार्कों, स्ट्रीट लाइटों, शौचालयों इत्यादि की मरम्मत में लग जाता है। बाकी बजट शहर में नई ढांचागत सुविधाओं के निर्माण में लग जाता है।