जल विद्युत के लाभ-हानि

By: Nov 8th, 2010 9:01 pm

– डा. भरत झुनझुनवाला, लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं

परियोजना से समाज को भारी नुकसान होता है। नदी को टनल में बहाने से पानी का धरती, हवा एवं सूक्ष्म प्राणियों से संपर्क कट जाता है, जिससे उसकी गुणवत्ता में गिरावट आती है…

हमारे पूर्वजों ने आचरण का मंत्र दिया था ‘धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष’ यानी धर्म के लिए अर्थ को त्याग दो, अर्थ के लिए काम को त्याग दो। यहां धर्म का अर्थ हिंदू, मुस्लिम एवं ईसाई धर्मों से नहीं है, बल्कि पर्यावरण, शांति एवं सौहार्द से लेना चाहिए। अर्थात यह मंत्र बताता है कि पर्यावरण की रक्षा करने के लिए आर्थिक लाभ को त्याग देना चाहिए। जैसे घर के आंगन में नीम का पेड़ हो तो पर्यावरण शुद्ध होता है। दुकान बनाने के लिए नीम का पेड़ नहीं काटना चाहिए। दुकान का आकार ऐसा बनाना चाहिए, जिसमें पेड़ भी जिंदा रहे और दुकान भी बन जाए। पेड़ को बचाए रखने से आय लंबे समय तक होती है। पर्यावरण शुद्ध रहता है, बीमारी कम होती है और कार्य करने की क्षमता में वृद्धि होती है। छोटी दुकान बनाने से जितनी आय की हानि होती है, उससे ज्यादा लाभ पर्यावरण की शुद्धि से हासिल हो जाता है। इसी मंत्र को केंद्र सरकार ने उत्तराखंड में बन रही लोहारीनागपाला परियोजना पर लागू किया है। पर्यावरणविद डा. जीडी अग्रवाल की मांग थी कि गंगोत्री से उत्तरकाशी तक भागीरथी पर कोई भी जल विद्युत परियोजना न बनाई जाए। उनका कहना था कि मुक्त बहाव वाली गंगा के दर्शन एवं स्नान से देशवासियों को ज्यादा लाभ होगा। तुलना में बिजली से कम लाभ होगा। इस आकलन में विशेष दृष्टि का समावेश है। गंगा में स्नान करने से लाभ मुख्यतः आस्थावान तीर्थ यात्रियों को होता है। इसके विपरीत बिजली के उपयोग से अधिकतर लाभ उच्च आय वाले शहरवासियों को होता है, जिन्हें तुलनात्मक दृष्टि से भोगी कहा जा सकता है। अतः परियोजना रद्द करने से आस्थावान तीर्थयात्रियों को लाभ होता है, जबकि परियोजना के निर्माण से उच्चवर्गीय भोगियों को लाभ होता है। इस द्वंद्व में केंद्र सरकार ने तीर्थयात्रियों का पक्ष लिया है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। लोहारीनागपाला परियोजना का लाभ उच्चवर्गीय शहरवासियों को हो तो भी इस देश का लाभ ही कहा जाएगा। केंद्र सरकार का ऊर्जा मंत्रालय इस परियोजना को बनाने को आतुर था। ऊर्जा मंत्रालय का मानना था कि परियोजना देश के आर्थिक विकास के हित में है। इसलिए पर्यावरण एवं आस्था के नाम पर इसे बंद नहीं करना चाहिए, लेकिन परियोजना के आंकड़ों से अलग ही कहानी सामने आती है। परियोजना को बनाने वाली सरकारी कंपनी नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन ने पर्यावरण मंत्रालय के सामने परियोजना के लाभ-हानि का चिट्ठा दाखिल किया है। कहा है कि परियोजना की लागत 2775 करोड़ रुपए है। इससे 446 करोड़ रुपए प्रति वर्ष का लाभ बिजली के विक्रय से होगा। आठ करोड़ रुपए प्रति वर्ष का लाभ कर्मियों के रोजगार के माध्यम से होगा। कुल लाभ 454 करोड़ रुपए प्रति वर्ष होगा जो कि पूंजी पर 16 प्रतिशत का उत्तम रिजल्ट देता है। इस प्रकार परियोजना को आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद बताया गया है। परियोजना द्वारा बताया गया लाभ सच्चा नहीं है। लोहारी नागपाला परियोजना से बिजली की उत्पादन लागत 1.78 रुपए प्रति यूनिट बैठती है। यदि यह परियोजना नहीं बनेगी, तो उपभोक्ता को बिजली दूसरे महंगे स्रोतों से खरीदनी होगी। मेरा आकलन है कि दूसरे स्रोत से बिजली 2.60 पैसे प्रति यूनिट बैठेगी। इस प्रकार परियोजना का लाभ 80 पैसे प्रति यूनिट अथवा 143 करोड़ प्रति वर्ष होगा। लाभ को आज की गणना के लिए डिस्काउंट किया जाता है। जैसे पांच वर्ष बाद फिक्स डिपाजिट से आप पाना चाहते हों, तो आज केवल 660 रुपए जमा करवाने होते हैं। डिस्काउंट करने के बाद 30 वर्षों में यह रकम 688 करोड़ बैठती है। रोजगार से भविष्य में होने वाले लाभ की रकम 42.4 करोड़ रुपए बैठती है। परियोजना के 30 वर्ष के जीवन काल में कुल 730 करोड़ रुपए बैठती है। यानि देश के लिए परियोजना घाटे का सौदा है। 2775 करोड़ की लागत के सामने लाभ केवल 730 करोड़ है। इसके अलावा परियोजना से समाज को भारी नुकसान होता है। नदी को टनल में बहाने से पानी का धरती, हवा एवं सूक्ष्म प्राणियों से संपर्क कट जाता है, जिससे उसकी गुणवत्ता में गिरावट आती है। जैसे गंगाजी में स्नान करने और पाइप से बाथरूम में आए गंगा के पानी से स्नान करने में अंतर होता है। दूसरे टनल बनाने में पहाड़ों के पानी के एक्वीफर फूट जाते हैं। पहाड़ में एकत्रित पानी बह जाता है। वृक्षों को पानी कम मिलता है। जंगल कमजोर पड़ते हैं। वायुमंडल से कार्बन कम मात्रा में सोखा जाता है। इससे ग्लोबल वार्मिंग होती है। तीसरे टनल बनाने के लिए किए गए विस्फोटों से पहाड़ कमजोर हो जाते हैं। भू-स्खलन ज्यादा होता है और जान माल की हानि होती है। चौथे नदी में पलने वाली मछलियां आदि की जैविक विविधता नष्ट हो जाती है। पांचवें स्थानीय लोगों को वहां से मिलने वाली बालू एवं मछली समाप्त हो जाती है। छठे नदी में चल रहे राफ्टिंग जैसे उद्योग बंद हो जाते हैं। सातवें बहती नदी का सौंदर्य एवं नैसर्गिकता समाप्त हो जाती है। नदी को निहारने का आनंद समाप्त हो जाता है।
इन नुकसानों की गणना की जाए, तो सिद्ध हो जाएगा कि लोहारी नागपाला पूर्णतया जनहित के विरुद्ध है।

लोहारी नागपाला आर्थिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से असफल है। फिर भी केंद्र सरकार का ऊर्जा मंत्रालय इसे बनाने को उद्यत है। कारण कि परियोजना एक विशेष वर्ग के लिए लाभप्रद है, जैसे सिगरेट और शराब की मार्केटिंग विशेष वर्ग के लिए लाभप्रद है। जहां तक एनटीपीसी का सवाल है, घोषित 1.78 रुपए के बिजली के विक्रय मूल्य पर यह परियोजना घाटे का सौदा है। 446 करोड़ की कुल बिक्री में कंपनी का लाभ 110 करोड़ भी मान लें, तो भी कुल लागत पर लाभांश मात्र चार प्रतिशत बैठता है। वास्तव में बिजली की बिक्री1.78 से ऊंचे दाम पर की जाएगी, परंतु केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण से स्वीकृति लेने के लिए इसे कम दिखाया गया है। अर्थ हुआ कि उपभोक्ता को नुकसान होगा और एनटीपीसी को लाभ। इसके अलावा ऊर्जा मंत्रालय के लाभ भी परियोजना से जुड़े हुए हैं। दूसरी सार्वजनिक इकाइयों की तरह एनटीपीसी द्वारा भी उच्च अधिकारियों को राशि पहुंचाई जाती होगी। संभवतया इस राशि की लालच में ऊर्जा मंत्रालय इस हानिप्रद परियोजना को लागू करना चाहता हो। राज्य सरकार भी परियोजना के पक्ष में खड़ी है, चूंकि इसे उत्पादित बिजली में से 12 प्रतिशत बिजली मुफ्त मिलेगी, जिससे हुई आय से सरकारी कर्मचारियों के वेतन, भत्ते एवं सुविधाओं का भुगतान किया जा सकेगा। लोहारी नागपाला के चलने से अन्य जल विद्युत परियोजनाओं का भी आबंटन किया जा सकेगा। याद रहे कि हाल में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने 56 आबंटनों को अनियमितताओं के चलते रद्द किया था। अतः लोहारीनागपाला परियोजना में धर्म और अर्थ का द्वंद्व नहीं, बल्कि अनर्थ और कमीशन का द्वंद्व निहित था। यह परियोजना न तो धर्म का विस्तार करती थी न ही अर्थ का। केवल सरकारी अधिकारियों के पोषण के लिए इसे बनाया जा रहा था। इसे रद्द करना सर्वथा उचित है।